ये सबाहत की ज़ौ महचकाँ  – महचकाँ
ये पसीने की रौ कहकशाँ  – कहकशाँ।

इश्क़ था एक दिन दास्ताँ-दास्ताँ
आज क्यों है वही बेज़बाँ-बज़बाँ।

दिल को पाया नहीं मंज़िलों-मंज़िलों
हम पुकार आये हैं कारवाँ-कारवाँ।

इश्क़ भी शादमाँ-शादमाँ इन दिनों
हुस्न भी इन दिनों मेहरबाँ-मेह्‌रबाँ।

है तेरा हुस्ने-दिलकश, सरापा सवाल
है तेरी हर अदा, चीस्ताँ-चीस्ताँ।

दम-बदम शबनमो-शोला की ये लवें
सर से पा तक बदन गुलसिताँ-गुलसिताँ।

बैठना नाज़ से अंजुमन-अंजुमन
देखना नाज़ से, दास्ताँ – दास्ताँ।

महकी-महकी फ़जाँ खु़शबू-ए-ज़ुल्फ़ से
पँखड़ी होंट की, गुलफ़शाँ-गुलफ़शाँ।

जिसके साये में इक ज़िन्दगी कट गयी
उम्रे – ज़ुल्फ़े – रसा जाविदाँ-जाविदाँ।

ले उड़ी है मुझे बू – ए – ज़ुल्फ़े सियह
ये खिली चाँदनी बोसताँ – बोसताँ।

आज संगम सरासर जु – ए इश्क़ है
एक दरिया – ए – ग़म बेकराँ – बेकराँ।

जिस तरफ़ जाइये मतला-ए-नूर-नूर
जिस तरफ़ जाइये महवशाँ-महवशाँ।

बू ज़मी से मुझे आ रही है तेरी
तुझको क्यों ढूँढिये आसमाँ-आसमाँ।

सच बता मुझको, क्या यूँ ही कट जायेगी
ज़िन्दगी इश्क़ की रायगाँ-रायगाँ।

रूप की चाँदनी सोज़े-दिल सोज़े-दिल
मौज़े-गंगो-जमन साज़े-जाँ साज़े-जाँ।

अहदो-पैमाँ कोई, हुस्न भी क्या करे
इश्क़ भी तो है कुछ बदगुमाँ-बदगुमाँ।

जैसे कौनैन  के दिल प हो बोझ सा
इश्क़ से हुस्न है सरगराँ-सरगराँ।

क्यों फ़ज़ाओं की आँखों में थे अश्क़ से
वो सिधारे हैं जब शादमाँ-शादमाँ।

लब प आयी न वो बात ही हमनशीं
आये क्या-क्या सुख़न दरम्याँ-दरम्याँ।

ढूँढते-ढूँढते ढूँढ लेंगे तुझे
गो निशा है तेरा बेनिशाँ-बेनिशाँ।

मेरे दारुल-अमाँ , ऐ हरीमे-निगार
हम फिरें क्या युँही बेअमाँ-बेअमाँ।

यूँ घुलेगा-घुलेगा, तेरे इश्क़ में
रह गया इश्क़, अब उस्तुख़ाँ -उस्तुखाँ।

हमको सुनना बहरहाल तेरी ख़बर
माजरा-माजरा, दास्ताँ-दास्ताँ।

उसके तेवर पर क़ुर्बान लुत्फ़ो-करम
मेहरबाँ-मेहरबाँ क़ह्रमाँ-कह्रमाँ ।

जी में आता है तुझको पुकारा करूँ
रहगुज़र-रहगुज़र आस्ताँ-आस्ताँ।

याद आने लगीं फिर अदायें तेरी
दिलनशीं-दिलनशीं जांसिताँ-जांसिताँ।

क्यों तेरे ग़म की चिंगारियाँ हो गयीं
सोज़े-दिल सोज़े दिल सोज़े जाँ सोज़े जाँ।

साथ है रात की रात वो रश्के-मह
मेजबाँ-मेजबाँ मेहमाँ-मेहमाँ।

इश्क़ की ज़िन्दगी भी ग़रज़ कट गयी
ग़मज़दा-ग़मज़दा शादमाँ-शादमाँ।

अब पड़े – अब पड़े उनके माथे प बल
अलहज़र-अलहज़र अल‍अमाँ – अल‍अमाँ।

इश्क़ ख़ुद अपनी तारीफ़ यूँ कर गया
अह्रमन – अह्रमन ईज़दाँ-ईज़दा।

कैफ़ो-मस्ती है इमकाँ-दर-इमकाँ, ’फ़िराक़’
चाँदनी है अभी नौजवाँ-नौजवाँ।

By shayar

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