Category Archives: Ramdhari Singh Dinkar

हमारे कृषक

जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है  मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का…

कलम या कि तलवार

दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गानया तलवार पकड़ जीतोगे…

स्वर्ग

स्वर्ग की जो कल्पना है,व्यर्थ क्यों कहते उसे तुम?धर्म बतलाता नहीं संधान यदि इसका?स्वर्ग का तुम आप आविष्कार कर लेते।

माध्यम

मैं माध्यम हूँ, मौलिक विचार नहीं,कनफ़्युशियस ने कहा । तो मौलिक विचार कहाँ मिलते हैं,खिले हुए फूल हीनए वृन्तों परदुबारा खिलते हैं । आकाश पूरी तरहछाना जा चुका है,जो कुछ…

व्याल-विजय

झूमें झर चरण के नीचे मैं उमंग में गाऊँ.तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।  यह बाँसुरी बजी माया के मुकुलित आकुंचन में,यह बाँसुरी बजी अविनाशी के…

अवकाश वाली सभ्यता

मैं रात के अँधेरे मेंसिताओं की ओर देखता हूँ जिन की रोशनी भविष्य की ओर जाती है अनागत से मुझे यह खबर आती है की चाहे लाख बदल जायेमगर भारत भारत रहेगा…

रोटी और स्वाधीनता

(1)आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ?मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ?आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,पर कहीं भूख बेताब हुई…

सिपाही

वनिता की ममता न हुई, सुत का न मुझे कुछ छोह हुआ,ख्याति, सुयश, सम्मान, विभव का, त्यों ही, कभी न मोह हुआ।जीवन की क्या चहल-पहल है, इसे न मैने पहचाना,सेनापति…

लोहे के पेड़ हरे होंगे,

लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल,नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, आँसू के कण बरसाता चल।सिसकियों और चीत्कारों से,जितना भी हो आकाश भरा,कंकालों क हो ढेर,खप्परों से चाहे…

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

== हिमालय == मेरे नगपति! मेरे विशाल!साकार, दिव्य, गौरव विराट्,पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल!मेरी जननी के हिम-किरीट!मेरे भारत के दिव्य भाल!मेरे नगपति! मेरे विशाल! युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त,युग-युग गर्वोन्नत, नित महान,निस्सीम…

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानीलेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानीराजा के मुख में हँसी कण्ठ में मालारानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी डोलती सुरभि राजा घर कोने कोनेपरियाँ…

पक्षी और बादल

ये भगवान के डाकिये हैं,जो एक महादेश सेदूसरे महादेश को जाते हैं। हम तो समझ नहीं पाते हैं,मगर उनकी लायी चिठि्ठयाँपेड़, पौधे, पानी और पहाड़बाँचते हैं। हम तो केवल यह…