Category Archives: poets name with R

यूँ जो ढूँढो तो यहाँ शहर में अन्क़ा निकले

यूँ जो ढूँढो तो यहाँ शहर में अन्क़ा निकले चाहने वाला जो चाहो तो ना-असला निकले जी में है चीर के सीना मैं निकालूँ दिल को तो किसी ढब से…

तर्क जिस दिन से किया हम ने शकेबाई का

तर्क जिस दिन से किया हम ने शकेबाई का जा-ब-जा शहर में चर्चा हुआ रूसवाई का ग़ैर दाग़-ए-दिल-ए-सद-चाक न मोनिस न रफ़ीक़ ज़ोर आलम पे है आलम मिरी तन्हाई का…

क़ुरआँ किताब है रूख़-ए-जानाँ के सामने

क़ुरआँ किताब है रूख़-ए-जानाँ के सामने मुसहफ़ उठा लूँ साहब-ए-क़ुरआँ के सामने जन्नत है गर्द कूचा-ए-जानाँ के सामने दोज़ख है सर्द सीना-ए-सोज़ाँ के सामने सकता अभी हो रूह-ए-सिंकदर को शर्म…

नासेहा फ़ाएदा क्या है तुझे बहकाने से

नासेहा फ़ाएदा क्या है तुझे बहकाने से कार-ए-हुश्यार कहीं भी हुआ दीवाने से न ग़रज़ काबे से मतलब है न बुत-ख़ाने से है फ़क़त जौक़ मुझे यार के घर जाने…

मरीज़-ए-हिज्र को सेहत से अब तो काम नहीं

मरीज़-ए-हिज्र को सेहत से अब तो काम नहीं अगरचे सुब्ह को ये बच गय तो शाम नहीं रखो या न रखो मरहम उस पे हम समझे हमारे ज़ख़्म-ए-जुदाई को इल्तियाम…

लाज़िम है सोज़-ए-इश्क़ का शोला अयाँ न हो

लाज़िम है सोज़-ए-इश्क़ का शोला अयाँ न हो जल-बुझिये इस तरह से कि मुतलक़ धुआँ न हो ज़ख़्म-ए-जिगर का वा किसी सूरत वहाँ न हो पैकान-ए-यार इस में शक्ल-ए-ज़बाँ न…

क्या ग़ज़ब है कि चार आँखों में

क्या ग़ज़ब है कि चार आँखों में दिल चुराता है यार आँखों में चश्म-ए-कै़फी के सुर्ख़ डोरों से छा रही है बहार आँखों में गिर पड़ा तिफ़्ल-ए-अश्क़ ये मचला मैं…

किस तरह पर ऐसे बद-ख़ू से सफ़ाई कीजिए

किस तरह पर ऐसे बद-ख़ू से सफ़ाई कीजिए जिस की तीनत में यही हो कज-अदाई कीजिए जब मसीहा की हो मर्ज़ी कज-अदाई कीजिए इस जगह क्या दर्द-ए-दिल की फिर दवाई…

करूँ शिकवा न क्यूँ चर्ख़-ए-कुहन से

करूँ शिकवा न क्यूँ चर्ख़-ए-कुहन से कि फ़ुर्क़त डाली तुझ से गुल-बदन से तिरी फ़ुर्क़त का ये सदमा पड़ा यार ज़बाँ ना-आश्ना हो गई सुख़न से दम-ए-तकफ़ीन भी गर यार…

इस तरह आह कल हम उस अंजुमन से निकले

इस तरह आह कल हम उस अंजुमन से निकले फ़स्ल-ए-बहार में जूँ बुलबुल चमन से निकले आती लपट है जैसी ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं से क्या ताब है जो वो बू मश्क-ए-ख़ुतन से…

फ़स्ल-ए-गुल में जो कोई शाख़-ए-सनोबर तोड़े

फ़स्ल-ए-गुल में जो कोई शाख़-ए-सनोबर तोड़े बाग़बाँ ग़ैब का उस का वहीं फिर सर तोड़े दस्त-ए-सय्याद में कहती थी ये कल बुलबुल-ए-ज़ार क्या रिहाई का मज़ा है जो मिरे पर…