Category Archives: Kunvar Narayan

किसी पवित्र इच्छा की घड़ी में

व्यक्ति को विकार की ही तरह पढ़ना जीवन का अशुद्ध पाठ है। वह एक नाज़ुक स्पन्द है समाज की नसों में बन्द जिसे हम किसी अच्छे विचार या पवित्र इच्छा…

उनके पश्चात्

कुछ घटता चला जाता है मुझमें उनके न रहने से जो थे मेरे साथ मैं क्या कह सकता हूँ उनके बारे में, अब कुछ भी कहना एक धीमी मौत सहना…

दूसरी तरफ़ उसकी उपस्थिति

वहाँ वह भी था जैसे किसी सच्चे और सुहृद शब्द की हिम्मतों में बँधी हुई एक ठीक कोशिश……. जब भी परिचित संदर्भों से कट कर वह अलग जा पड़ता तब…

यक़ीनों की जल्दबाज़ी

एक बार ख़बर उड़ी कि कविता अब कविता नहीं रही और यूँ फैली कि कविता अब नहीं रही ! यक़ीन करनेवालों ने यक़ीन कर लिया कि कविता मर गई, लेकिन शक़…

कविता की ज़रूरत

बहुत कुछ दे सकती है कविता क्यों कि बहुत कुछ हो सकती है कविता ज़िन्दगी में अगर हम जगह दें उसे जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़ जैसे तारों…

कविता

कविता वक्तव्य नहीं गवाह है कभी हमारे सामने कभी हमसे पहले कभी हमारे बाद कोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता भाषा में उसका बयान जिसका पूरा मतलब है सचाई…

जन्म-कुंडली

फूलों पर पड़े-पड़े अकसर मैंने ओस के बारे में सोचा है – किरणों की नोकों से ठहराकर ज्योति-बिन्दु फूलों पर किस ज्योतिर्विद ने इस जगमग खगोल की जटिल जन्म-कुंडली बनायी…

उत्केंद्रित

मैं ज़िंदगी से भागना नहीं उससे जुड़ना चाहता हूँ। – उसे झकझोरना चाहता हूँ उसके काल्पनिक अक्ष पर ठीक उस जगह जहाँ वह सबसे अधिक बेध्य हो कविता द्वारा। उस…

दीवारें

अब मैं एक छोटे-से घर और बहुत बड़ी दुनिया में रहता हूँ कभी मैं एक बहुत बड़े घर और छोटी-सी दुनिया में रहता था कम दीवारों से बड़ा फ़र्क पड़ता…

कुछ अधिक गहरा हुआ है ।

जिस समय में सब कुछ इतनी तेजी से बदल रहा है वही समय मेरी प्रतीक्षा में न जाने कब से ठहरा हुआ है ! उसकी इस विनम्रता से काल के प्रति…

कभी पाना मुझे

तुम अभी आग ही आग मैं बुझता चिराग हवा से भी अधिक अस्थिर हाथों से पकड़ता एक किरण का स्पन्द पानी पर लिखता एक छंद बनाता एक आभा-चित्र और डूब…

अच्छा लगा

पार्क में बैठा रहा कुछ देर तक अच्छा लगा, पेड़ की छाया का सुख अच्छा लगा, डाल से पत्ता गिरा- पत्ते का मन, “अब चलूँ” सोचा, तो यह अच्छा लगा…