Category Archives: Arzoo Lakhnavi

अलअमाँ मेरे ग़मकदे की शाम

अलअमाँ मेरे ग़मकदे की शाम। सुर्ख़ शोअ़ला सियाह हो जाये॥ पाक निकले वहाँ से कौन जहाँ । उज़्रख़्वाही गुनाह हो जाये॥ इन्तहाये-करम वो है कि जहाँ। बेगुनाही गुनाह हो जाये॥

फिर ‘आरजू’ को दर से उठा

फिर ‘आरजू’ को दर से उठा, पहले यह बता। आखिर ग़रीब जाये कहाँ और कहाँ रहे॥ — — — था शौके़दीद ताब-ए-आदाबे-बज़्मेनाज़। यानी बचा-बचा के नज़र देखते रहे॥ अहले-क़फ़स का…

क्यों उसकी यह दिलजोई दिल जिसका दुखाना है

क्यों उसकी यह दिलजोई दिल जिसका दुखाना है। ठहरा के निशाने को क्या तीर लगाना है॥ अंदाज़े-तग़ाफ़ुल पर दिल चोट तो खा बैठा। अब उनकी निशानी को, उनसे भी छुपाना…

भले दिन आये तो आज़ार बन गया आराम

भले दिन आये तो आज़ार बन गया आराम। क़फ़स के तिनके भी काम आ गए नशेमन के॥ मिटा के फिर तो बनाने पर अब नहीं काबू। वो सर झुकाए खड़े…

नालाँ ख़ुद अपने दिल से हूँ दरबाँ को क्या कहूँ

नालाँ ख़ुद अपने दिल से हूँ दरबाँ को क्या कहूँ। जैसे बिठाया गया है, कोई पाँव तोड़ के॥ क्या जाने टपके आँख से किस वक़्त खू़नेदिल। आँसू गिरा रहा हूँ…

सबब बग़ैर था हर जब्र क़ाबिले इल्ज़ाम

सबब बग़ैर था हर जब्र क़ाबिले इल्ज़ाम। बहाना ढूंढ लिया, देके अख्तियार मुझे॥ किया है आग लगाने को बन्द दरवाज़ा। कि होंट सी के बनाया है राज़दार मुझे॥

उठ खडा़ हो तो बगोला है, जो बैठे तो गु़बार

उठ खडा़ हो तो बगोला है, जो बैठे तो गु़बार। ख़ाक होकर भी वही शान है, दीवाने की॥ ‘आरज़ू’! ख़त्म हक़ीक़त पै हुआ दौरे-मजाज़। डाली काबे की बिना, आड़ से…

हुस्ने-सीरत पर नज़र कर

हुस्ने-सीरत पर नज़र कर, हुस्ने-सूरत को न देख। आदमी है नाम का गर ख़ू नहीं इन्सान की॥ ध्यान आता है कि टूटा था, ग़लमफ़हमी में अहद। यादगार इक है तो…

हर दाने पै इक क़तरा, हर क़तरे पै इक दाना। 

हर दाने पै इक क़तरा, हर क़तरे पै इक दाना। इस हाथ में सुमरन है, उस हाथ में पैमाना॥ कुछ तंगियेज़िन्दाँ से दिलतंग नहीं वहशी। फिरता है निगाहों में, वीरना-ही-वीराना॥

सरूरे-शब का नहीं, सुबह का ख़ुमार हूँ मैं। 

सरूरे-शब का नहीं, सुबह का ख़ुमार हूँ मैं। निकल चुकी है जो गुलशन से वो बहार हूँ मैं॥ करम पै तेरे नज़र की तो ढै गया वह गरूर। बढ़ा था…

न यह कहो “तेरी तक़दीर का हूँ मैं मालिक। 

न यह कहो “तेरी तक़दीर का हूँ मैं मालिक। बनो जो चाहो ख़ुदा के लिए, ख़ुदा न बनो॥ अगर है जुर्मे-मुहब्बत तो ख़ैर यूँ ही सही। मगर तुम्हीं कहीं इस…

आफ़त में पडे़ दर्द के इज़हार से हम और

आफ़त में पडे़ दर्द के इज़हार से हम और। याद आ गये भूले हुए कुछ उसको सितम और॥ हम ‘आरज़ू’ इस शान से पहुँचे सरेमंज़िल। ख़ुद लग़्ज़िशेपा ले गई दो-चार…