Category Archives: Arsh Malsiyani

सफ़-ए-अव्वाल से फ़क्त एक ही मयक्वार उठा

सफ़-ए-अव्वाल से फ़क्त एक ही मयक्वार उठा । कितनी सुनासान है तेरी महफ़िल साकी ।। ख़त्म हो जाए न कहीं ख़ुशबू भी फूलों के साथ, यही खुशबू तो है इस…

जंगे-कोरिया

सुलह के नाम पर लड़ाई है अम्ने-आलम तेरी दुहाई है सुलह-जूई से बढ़ गई पैकार आदमी-आदमी से है बेज़ार आदमीयत का सीना चाक हुआ क़िस्सा-इन्सानियत का पाक हुआ आदमी-ज़ाद से…

आज़ाद-शेर

मेरी ख़मोशी-ए-दिल पर न जाओ कि इसमें रूह की आवाज़ भी है – हर गुल हमारी अक्ल पै हँसता रहा मगर हम फ़स्ले-गुल में रंगे-ख़िज़ाँ देखते रहे – मेरा कारवाँ…

तूफ़ाँ के तलातुम में किनारा क्या है

तूफ़ाँ के तलातुम में किनारा क्या है, गरदा में तिनके का सहारा क्या है. सोचा भी ऐ ज़ीस्त पे मरने वाले, मिटती हुई मौजों का इशारा क्या है?

देहाती दोशीज़ा

कारवाँ तारीकियों का हो गया आख़िर रवाँ जानिबे-मशरिक़ से निकला आफ़ताबे-ज़रफ़िशाँ ओस के क़तरे में मोती की चमक पैदा हुई रेत के ज़र्रे में हीरे की दमक पैदा हुई नूर…

फ़िसादात

ख़याबाँ-ओ-बाग़ो-चमन जल रहे थे बयाबाँ-ओ-कोहो-दमन जल रहे थे चले मौज दर मौज नफ़रत के धारे बढ़े फ़ौज दर फ़ौज वहशत के मारे न माँ की मुहब्बत ही महफ़ूज़ देखी न…

तू आतिशे-दोज़ख़ का सज़ावार कि मै

तू आतिशे-दोज़ख़ का सज़ावार कि मै? तू सबसे बड़ा मुलहदो-ऐय्यार कि मैं? अल्लाह को भी बना दिया हूर फ़रोश ऐ शैख़ बता तू है गुनहगार कि मैं?

फ़रदौस के चश्मों की रवानी पै न जा

फ़रदौस के चश्मों की रवानी पै न जा ऐ शैख़ तू जन्नत की कहानी पै न जा इस वहम को छोड़ अपने बुढ़ापे को ही देख हूरान-ए-बहिश्ती की जवानी पै…

हर ज़र्फ़ को अन्दाज़े से तोल ऐ साक़ी

हर ज़र्फ़ को अन्दाज़े से तोल ऐ साक़ी यह बुख़्ल भरे बोल न बोल ऐ साक़ी मैं और तेरी तल्ख़नबाज़ी तौबा यह ज़हर न इस शहद में घोल ऐ साक़ी

रिन्दों के लिए मंज़िलें-राहत है यही

रिन्दों के लिए मंज़िलें-राहत है यही मैख़ान-ए-पुरकैफ़-ए-मसर्रत है यही पीकर तू ज़रा सैरे-जहां कर ऐ शैख तू ढूंढता है जिसको वह जन्नत है यही

मग़रिब से उमड़ते हुए बादल आए

मग़रिब से उमड़ते हुए बादल आए भीगी हुई ऋतु और सुहाने साए साक़ी, लबे जू, मुतरबे-नौ.ख़ेज़, शराब है कोई जो वाइज़ को बुला कर लाए?

अपनी निगाहे-शोख़ से छुपिये तो जानिए

अपनी निगाहे-शोख़ से छुपिये तो जानिए महफ़िल में हमसे आपने पर्दा किया तो क्या? सोचा तो इसमें लाग शिकायत की थी ज़रूर दर पर किसी ने शुक्र का सज़्दा किया…