Category Archives: Ameer Minai

ग़म-ए-मोहब्बत में दिल के दाग़ों से रू-कश-ए-लाला-ज़ार हूँ मैं 

ग़म-ए-मोहब्बत में दिल के दाग़ों से रू-कश-ए-लाला-ज़ार हूँ मैं फ़ज़ा बहारीं है जिस के जल्वों से वो हरीफ़-ए-बहार हूँ मैं खटक रहा हूँ हर इक की नज़रों में बच के…

फुटकर शेर / अमीर मीनाई

1. उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो,   हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो। 2.इक फूल है गुलाब का आज उनके हाथ में,   धड़का…

अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआ

अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआ वो बुत वफ़ा पे न आया मैं बे-वफ़ा न हुआ। सर-ए-नियाज़ को तेरा ही आस्ताना हुआ शराब-ख़ाना हुआ या क़िमार-ख़ाना हुआ। हुआ फ़रोग़…

कहा जो मैंने कि यूसुफ़ को ये हिजाब न था

कहा जो मैंने कि यूसुफ़ को ये हिजाब न था तो हँस के बोले वो मुँह क़ाबिल-ए-नक़ाब न था। शब-ए-विसाल भी वो शोख़ बे-हिजाब न था नक़ाब उलट के भी…

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो

ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो दिल में हज़ार दर्द उठे आँख तर न हो। मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब दो-चार साल तक तो…

ना शौक़ ए वस्ल का दावा ना ज़ौक ए आश्नाई का 

ना शौक़ ए वस्ल का दावा ना ज़ौक ए आश्नाई का ना इक नाचीज़ बन्दा और उसे दावा ख़ुदाई का कफ़स में हूँ मगर सारा चमन आँखों के आगे है…

क़ैदी जो था वो दिल से ख़रीदार हो गया

क़ैदी जो था वो दिल से ख़रीदार हो गया यूसुफ़ को क़ैदख़ाना भी बाज़ार हो गया उल्टा वो मेरी रुह से बेज़ार हो गया मैं नामे-हूर ले के गुनहगार हो…

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझको रात भर रक्खा

फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझको रात भर रक्खा कभी तकिया इधर रक्खा, कभी तकिया उधर रक्खा बराबर आईने के भी न समझे क़द्र वो दिल की  इसे ज़ेरे-क़दम रक्खा उसे पेशे-नज़र रक्खा तुम्हारे संगे-दर का एक टुकड़ा भी…

है दिल को शौक़ उस बुत-ए-क़ातिल की दीद का

है दिल को शौक़ उस बुत-ए-क़ातिल की दीद का होली का रंग जिस को लहू है शहीद का दुनिया परस्त क्या रहे उक़बा करेंगे तै निकलेगा ख़ाक घर से क़दम…

झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का 

झोंका इधर न आये नसीम-ए-बहार का नाज़ुक बहुत है फूल चराग़-ए-मज़ार का फिर बैठे-बैठे वाद-ए-वस्ल उस ने कर लिया फिर उठ खड़ा हुआ वही रोग इन्तज़ार का शाख़ों से बर्ग-ए-गुल…

अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है 

अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है तुझ से माँगूँ मैं तुझी को कि सब कुछ मिल जाये सौ सवालों से…

बन्दा-नवाज़ियों पे ख़ुदा-ए-करीम था 

बन्दा-नवाज़ियों पे ख़ुदा-ए-करीम था करता न मैं गुनाह तो गुनाह-ए-अज़ीम था बातें भी की ख़ुदा ने दिखाया जमाल भी वल्लाह क्या नसीब जनाब-ए-कलीम था दुनिया का हाल अहल-ए-अदम है ये…