Category Archives: Allama Iqbal

मेरा वतन वही है

चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे हक़ सुनाया, नानक ने जिस चमन में बदहत का गीत गाया, तातारियों ने जिसको अपना वतन बनाया, जिसने हेजाजियों से दश्ते अरब छुड़ाया, मेरा…

ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी

ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी न छूटे मुझ से लंदन में भी आदाब-ए-सहर-ख़ेज़ी कहीं सरमाया-ए-महफ़िल थी मेरी गर्म-गुफ़्तारी कहीं सब को परेशाँ कर गई मेरी कम-आमेज़ी ज़माम-ए-कार…

वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ

वो हर्फ़-ए-राज़ के मुझ को सिखा गया है जुनूँ ख़ुदा मुझे नफ़स-ए-जिब्रईल दे तो कहूँ सितारा क्या मेरी तक़दीर की ख़बर देगा वो ख़ुद फ़राख़ी-ए-अफ़लाक में है ख़्वार ओ ज़ुबूँ…

वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी

वहीं मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी मेरे काम कुछ न आया ये कमाल-ए-नै-नवाज़ी मैं कहाँ हूँ तू कहाँ है ये मकाँ के ला-मकाँ है ये जहाँ मेरा जहाँ है के…

तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं

तू ऐ असीर-ए-मकाँ ला-मकाँ से दूर नहीं वो जलवा-गाह तेरे ख़ाक-दाँ से दूर नहीं वो मर्ग़-ज़ार के बीम-ए-ख़िज़ाँ नहीं जिस में ग़मीं न हो के तेरे आशियाँ से दूर नहीं…

न तख़्त ओ ताज में ने लश्कर ओ सिपाह में है

न तख़्त ओ ताज में ने लश्कर ओ सिपाह में है जो बात मर्द-ए-क़लंदर की बार-गाह में है सनम-कदा है जहाँ और मर्द-ए-हक़ है ख़लील ये नुकता वो है के…

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर तस्ख़ीर-ए-मक़ाम-ए-रंग-ओ-बू कर तू अपनी ख़ुदी को खो चुका है खोई हुई शै की जुस्तुजू कर तारों की फ़ज़ा है बे-कराना तू भी ये मक़ाम-ए-आरज़ू…

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है फिर इस में अजब क्या के तू बे-बाक नहीं है है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिंहाँ ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक…

अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं

अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तेरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था…

लहू

लहू अगर लहू है बदन में तो ख़ौफ़ है न हिरास अगर लहू है बदन में तो दिल है बे-वसवास जिसे मिला ये मताए-ए-गराँ बहा उसको नसीमो-ज़र से मुहब्बत है, नै ग़मे-इफ़्लास

मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में

मेरी नवा-ए-शौक़ से शोर हरीम-ए-ज़ात में ग़ुलग़ुला-हा-ए-अल-अमाँ बुत-कदा-ए-सिफ़ात में हूर ओ फ़रिश्ता हैं असीर मेरे तख़य्युलात में मेरी निगाह से ख़लल तेरी तजल्लियात में गरचे है मेरी जुस्तुजू दैर ओ…

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ू-मंदी मक़ाम-ए-बंदगी दे कर न लूँ शान-ए-ख़ुदावंदी तेरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी हिजाब इक्सीर है…