Category Archives: Abdul Hameed

न अपना बाक़ी ये तन रहेगा न तन में ताब ओ तवाँ रहेगी

न अपना बाक़ी ये तन रहेगा न तन में ताब ओ तवाँ रहेगी अगर जुदाई में जाँ रहेगी तुम्हीं बताओ कहाँ रहेगी मिज़ा के तीरों से छान दिल को जो…

आप अगर हमको मिल गये होते

आप अगर हमको मिल गये होते बाग़ में फूल खिल गये होते आप ने यूँ ही घूर कर देखा होंठ तो यूँ भी सिल गये होते काश हम आप इस…

बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे

बातें तेरी वो वो फ़साने तेरे शगुफ़्ता शगुफ़्ता बहाने तेरे बस एक ज़ख़्म नज़्ज़ारा हिस्सा मेरा बहारें तेरी आशियाने तेरे बस एक दाग़-ए-सज्दा मेरी क़ायनात जबीनें तेरी आस्ताने तेरे ज़मीर-ए-सदफ़…

अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे

अब दो आलम से सदा-ए-साज़ आती है मुझे दिल की आहट से तेरी आवाज़ आती है मुझे या समात का भरम है या किसी नग़्में की गूँज एक पहचानी हुई…

तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं

तेरे दर पे वो आ ही जाते हैं जिनिको पीने की आस हो साक़ी आज इतनी पिला दे आँखों से ख़त्म रिंदों की प्यास हो साक़ी हल्क़ा हल्क़ा सुरूर है…

ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे

ऐ मैगुसारों सवेरे सवेरे बड़ी रोशनी बख़्शते हैं नज़र को ख़राबात के गिर्द फेरे पे फेरे तेरे गेसूओं के मुक़द्दस अँधेरे किसी दिन इधर से गुज़र कर तो देखो बड़ी…

सूरज की हर किरण तेरी सूरत पे वार दूँ

सूरज की हर किरण तेरी सूरत पे वार दूँ दोज़ख़ को चाहता हूँ कि जन्नत पे वार दूँ इतनी सी है तसल्ली कि होगा मुक़ाबला दिल क्या है जाँ भी…

अपनी ज़ुल्फ़ों को सितारों के हवाले कर दो

अपनी ज़ुल्फ़ों को सितारों के हवाले कर दो शहर-ए-गुल बादागुसारों के हवाले कर दो तल्ख़ि-ए-होश हो या मस्ती-ए-इदराक-ए-जुनूँ आज हर चीज़ बहारों के हवाले कर दो मुझ को यारो न…

सुबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं

सुबू को दौर में लाओ बहार के दिन हैं हमें शराब पिलाओ बहार के दिन हैं ये काम आईन-ए-इबादत है मौसम-ए-गुल में हमें गले से लगओ बहार के दिन हैं…

हँस के बोला करो बुलाया करो

हँस के बोला करो बुलाया करो आप का घर है आया जाया करो मुस्कुराहट है हुस्न का ज़ेवर रूप बढ़ता है मुस्कुराया करो हदसे बढ़कर हसीन लगते हो झूठी क़स्में…

साग़र से लब लगा के बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी

साग़र से लब लगा के बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी सहन-ए-चमन में आके बहुत ख़ुश है ज़िन्दगी आ जाओ और भी ज़रा नज़दीक जान-ए-मन तुम को क़रीब पाके बहुत ख़ुश है…

जब गर्दिशों में जाम थे

जब गर्दिशों में जाम थे कितने हसीं अय्याम थे हम ही न थे रुसवा फ़क़त वो आप भी बदनाम थे कहते हैं कुछ अर्सा हुआ क़ाबे में भी असनाम थे…