Category Archives: Aalam Khurshid

यह मेरी तौबा नतीजा है बुखले-साक़ी का।

यह मेरी तौबा नतीजा है बुखले-साक़ी का। ज़रा-सी पी के कोई मुँह ख़राब क्या करता? यही थी ज़ीस्त की लज़्ज़त यही थी इश्क़ की शान। शिकायते-तपिशो-इज़्तराब क्या करता॥ मुझे मिटा…

दिल का जिस शख़्स के पता पाया।

दिल का जिस शख़्स के पता पाया। उसको आफ़त में मुब्तला पाया॥ नफ़ा अपना हो कुच तो दो नुक़सान। मुझको दुनिया से खो के क्या पाया॥ बेकसी में भी गुज़र…

उठाए संग खड़े हैं सभी समर के लिए

उठाए संग खड़े हैं सभी समर के लिए दुआएँ खैर भी माँगे कोई शजर के लिए हमेशा घर का अंधेरा डराने लगता है मैं जब चिराग़ जलाता हूँ रहगुज़र के लिए ख़याल…

हथेली की लकीरों में इशारा और है कोई

हथेली की लकीरों में इशारा और है कोई मगर मेरे तअक़्क़ुब में सितारा और है कोई किसी साहिल पे जाऊं एक ही आवाज़ आती है तुझे रुकना जहाँ है वो किनारा और…

कभी कभी कितना नुकसान उठाना पड़ता है

कभी कभी कितना नुकसान उठाना पड़ता है ऐरों गैरों का एहसान उठाना पड़ता है टेढ़े मेढ़े रस्तों पर भी ख्वाबों का यह बोझ तेरी ख़ातिर मेरी जान उठाना पड़ता है…

किस लम्हे हम तेरा ध्यान नहीं करते

किस लम्हे हम तेरा ध्यान नहीं करते हाँ कोई अहद-ओ-पैमान नहीं करते हर दम तेरी माला जपते हैं लेकिन गलियों कूचों में ऐलान नहीं करते अपनी कहानी दिल में छुपा कर…

ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से

ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से मैं जी उठा हूँ ज़रा ताज़गी के आने से उदास हो गये यकलख़्त शादमां चेहरे मेरे लबों पे ज़रा सी हँसी के आने…

किसी ख़्याल को ज़ंजीर कर रहा हूँ मैं

किसी ख़्याल को ज़ंजीर कर रहा हूँ मैं शिकस्ता ख़्वाब की ताबीर कर रहा हूँ मैं मेरे वो ख़्वाब जो रंगों में ढल नहीं पाए उन्हीं को शेर में तस्वीर कर…

मेरे वो ख़्वाब जो रंगों में ढल नहीं पाए

किसी ख़्याल को ज़ंजीर कर रहा हूँ मैं शिकस्ता ख़्वाब की ताबीर कर रहा हूँ मैं मेरे वो ख़्वाब जो रंगों में ढल नहीं पाए उन्हीं को शेर में तस्वीर कर…

जमा हुआ है फ़लक पे कितना ग़ुबार मेरा

जमा हुआ है फ़लक पे कितना ग़ुबार मेरा जो मुझ पे होता नहीं है राज़ आश्कार मेरा तमाम दुनिया सिमट न जाए मिरी हदों में कि हद से बढ़ने लगा है अब इंतिशार मेरा…

जल बुझा हूँ मैं मगर सारा जहाँ ताक में है

जल बुझा हूँ मैं मगर सारा जहाँ ताक में है कोई तासीर तो मौजूद मिरी ख़ाक में है खेंचती रहती है हर लम्हा मुझे अपनी तरफ़ जाने क्या चीज़ है जो पर्दा-ए-अफ़्लाक…

जाना तो बहुत दूर है महताब के आगे

जाना तो बहुत दूर है महताब के आगे बढ़ते ही नहीं पाँव तिरे ख़्वाब से आगे कुछ और हसीं मोड़ थे रूदाद-ए-सफ़र  में लिक्खा न मगर कुछ भी तिरे बाब  से आगे तहज़ीब…