Category Archives: Shad Azeemabadi

हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़

हरगिज़ कभी किसी से न रखना दिला ग़रज़ जब कुछ ग़रज़ नहीं तो ज़माने से क्या ग़रज़ फैला के हाथ मुफ़्त में होगे ज़लील हम महरूम तेरे दर से फिरेगी…

सियाहकार सियह-रू ख़ता-शिआर आया 

सियाहकार सियह-रू ख़ता-शिआर आया तिरी जनाब में तेरा गुनाहगार आया ख़िज़ाँ का दौर गया मौसम-ए-बहार आया मगर न इस दिल-ए-बे-सब्र को क़रार आया कहीं जवाब न तू ने दिया यहाँ…

लुत्फ़ क्या है बे-ख़ुदी का जब मज़ा जाता रहा 

लुत्फ़ क्या है बे-ख़ुदी का जब मज़ा जाता रहा यूँ न मानूँ मैं मगर साग़र तो समझाता रहा ताक़ से मीना उतारा पाँव में लग्ज़िश हुई की न साक़ी से…

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर आरज़ू था 

फ़क़त शोर-ए-दिल-ए-पुर आरज़ू था न अपने जिस्म में हम थे न तू था हर इक के पाँव पर झुकते कटी उम्र न समझे हम कि किस क़ालिब में तू था…

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना 

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना हम अपना जानते हर चीज़ को होता जो यार अपना जमे किस तरह इस हैरत-कदे में ए‘तिबार अपना न दिल…

ना जाँ-बाज़ों का मजमा था न मुश्‍ताक़ों का मेला था 

ना जाँ-बाज़ों का मजमा था न मुश्‍ताक़ों का मेला था ख़ुदा जाने कहाँ मरता था मैं जब तू अकेला था घरौंदा यूँ खड़ा तो कर लिया है आरज़ूओं का तमाशा…

तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा 

तेरी ज़ुल्फ़ें ग़ैर अगर सुलझाएगा आँख वालों से न देखा जाएगा सब तरह की सख़्तियाँ सह जाएगा क्यूँ दिला तू भी कभी काम आएगा एक दिन ऐसा भी नासेह आएगा…

ता-उम्र आश्‍ना न हुआ दिल गुनाह का 

ता-उम्र आश्‍ना न हुआ दिल गुनाह का ख़ालिक भला करे तिरी तिरछी निगाह का तन्हा मज़ा उठाता है दिल रस्म-ओ-राह का बीना तो है पे बस नहीं चलता निगाह का…

तमाम उम्र नमक-ख़्वार थे ज़मीं के हम 

तमाम उम्र नमक-ख़्वार थे ज़मीं के हम वफ़ा सरिश्‍त में थी हो रहे यहीं के हम निकल के रूह डंवाडोल हो न जाए कहीं हज़ार हैफ़ न दुनिया के हैं…

जिसे पाला था इक मुद्दत तक आग़ोश-ए-तमन्ना में 

जिसे पाला था इक मुद्दत तक आग़ोश-ए-तमन्ना में वही बानी हुआ मेरे ग़म ओ दर्द ओ अज़िय्यत का उसी के हाथ से क्या क्या सहा सहना है क्या क्या कुछ…