Category Archives: Sahar Ishqabaadi

वो जो फ़िर्दोस-ए-नज़र है

वो जो फ़िर्दोस-ए-नज़र है आईना-ख़ाना अभी जलवा-गर जो वो न हों हो जाए वीराना अभी शम्अ की लू में समा कर ख़ुद सरापा नूर हो दूर-रस इतनी नहीं परवाज़-ए-परवाना अभी…

तिरा वहशी कुछ आगे है

तिरा वहशी कुछ आगे है जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ से कहीं दस्त ओ गिरेबाँ हो न आबादी बयाबाँ से इलाही जज़्बा-ए-दिल का असर इतना न हो उन पर परेशाँ वो न हो जाएँ…

तकमील-ए-इश्क़

तकमील-ए-इश्क़ जब हो कि सहरा भी छोड़ दे मजनूँ ख़याल-ए-महमिल-ए-लैला भी छोड़ दे कुछ इक्तिज़ा-ए-दिल से नहीं अक़्ल बे-नियाज़ तन्हा ये रह सके तो वो तन्हा भी छोड़ दे या…

मेरी क़िस्मत से क़फस का या तो दर खुलता नहीं

मेरी क़िस्मत से क़फस का या तो दर खुलता नहीं दर जो खुलता है तो बंद-ए-बाल-ओ-पर खुलता नहीं आह करता हूँ तो आती है पलट कर ये सदा आशिकों के…

जिस से वफ़ा की थी उम्मीद

जिस से वफ़ा की थी उम्मीद उस ने अदा किया ये हक औरों से इर्तिबात की और मुझे दिया क़लक़ तेरी जफ़ा वफ़ा सही मेरी वफ़ा जफ़ा सही ख़ून किसी…

जब सबक़ दे उन्हें आईना ख़ुद-आराई का

जब सबक़ दे उन्हें आईना ख़ुद-आराई का हाल क्यूँ पूछें भला वो किसी सौदाई का महव है अक्स-ए-दो आलम मिरी आँखों में मगर तू नज़र आता है मरकज़ मिरी बीनाई…

हुस्न-ए-मुतलक़ है क्या किसे मालूम

हुस्न-ए-मुतलक़ है क्या किसे मालूम इब्तिदा इंतिहा किस मालूम मेरी बे-ताबियों की खा के क़सम बर्क़ ने क्या किया किसे मालूम दिन दहाड़े शबाब के हाथों हाए मैं लुट गया…

हसीनों के तबस्सुम का तकाज़ा और ही कुछ है

हसीनों के तबस्सुम का तकाज़ा और ही कुछ है मगर कलियों के खिलने का नतीजा और ही कुछ है निगाहें मुश्तबा हैं मेरी पाकीज़ा निगाहों पर मिरे मासूम दिल पर…

फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना

फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना ठिकाना ढूँडे दौर-ए-ज़मीं-ओ-आसमाँ अपना ख़ुदा जब्बार है हर बंदा भी मजबूर ओ ताबे है दो आलम में नज़र आया न कोई…

दावर ने बंदे बंदों ने दावर बना दिया

दावर ने बंदे बंदों ने दावर बना दिया सागर ने क़तरे क़तरों ने सागर बिना दिया बे-ताबियों ने दिल की ब-उम्मीदर-शरह-ए-शौक़ उस जाँ-नवाज़ को भी सितम-गर बना दिया पहली सी…