Category Archives: Mustafa Khan ‘Shefta’

मर गए हैं जो हिज्र-ए-यार में हम

मर गए हैं जो हिज्र-ए-यार में हम सख़्त बे-ताब हैं मज़ार में हम ता दिल-ए-कीना-वर में पाएँ जगह ख़ाक हो कर मिले ग़ुबार में हम वो तो सौ बार इख़्तियार…

महव हूँ मैं जो उस सितम-गर का

महव हूँ मैं जो उस सितम-गर का है गिला अपने हाल ए अबतर का हाल लिखता हूँ जान-ए-मुज़्तर का रग-ए-बिस्मिल है तार मिस्तर का आँख फिरने से तेरी मुझ को…

कौन से दिन तेरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं

कौन से दिन तेरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं कौन सी शब है कि ख़जंर से जिगर चाक नहीं लुत़्फ़-ए-क़ातिल में तअम्मुल नहीं पर क्या कीजे सर-ए-शोरीदा मेरा क़ाबिल-ए-फ़ितराक नहीं तुझ…

कम-फ़हम हैं तो कम हैं परेशानियों में हम

कम-फ़हम हैं तो कम हैं परेशानियों में हम दानाइयों से अच्छे हैं नादानियों में हम शायद रक़ीब डूब मरें बहर-ए-शर्म में डूबंेगे मौज-ए-अश्क की तुग़़्यानियों में हम मोहताज-ए-फ़ैज़-ए-नामिया क्यूँ होते…

जब रक़ीबों का सितम याद आया

जब रक़ीबों का सितम याद आया कुछ तुम्हारा भी करम याद आया कब हमें हाजत-ए-परहेज़ पड़ी ग़म न खाया था कि सम याद आया न लिखा ख़त कि ख़त-ए-पेशानी मुझ…

है बद बला किसी को ग़म-ए-जावेदाँ न हो

है बद बला किसी को ग़म-ए-जावेदाँ न हो या हम न हों जहाँ में ख़ुदा या जहाँ न हो आईन-ए-अहल-ए-इश्क़ कहाँ और हम कहाँ ऐ आह शोला-बार न हो ख़ूँ-चुकाँ…

गोर में याद-ए-क़द-ए-यार ने सोने न दिया

गोर में याद-ए-क़द-ए-यार ने सोने न दिया फ़ितना-ए-हश्र को रफ़्तार ने सोने न दिया वाह रे ताला-ए-ख़ुफ़्ता के शब-ए-ऐश में भी वहम-ए-बे-ख़्वाबी-ए-अग़्यार ने सोने न दिया वा रहीं सूरत-ए-आग़ोश सहर…

गह हम से ख़फ़ा वो हैं गहे उन से ख़फ़ा हम

गह हम से ख़फ़ा वो हैं गहे उन से ख़फ़ा हम मुद्दत से इसी तरह निभी जाती है बाहम करते हैं ग़लत यार से इज़हार-ए-वफ़ा हम साबित जो हुआ इश्क़…

दिल लिया जिस ने बेवफ़ाई की

दिल लिया जिस ने बेवफ़ाई की रस्म है क्या ये दिल रूबाई की तजि़्करा सुल्ह-ए-गै़र का न करो बात अच्छी नहीं लड़ाई की तुम को अंदेशा-ए-गिरफ़्तारी याँ तवक़्क़ो नहीं रिहाई…

देखूँ तो कहाँ तक वो तलत्तुफ़ नहीं करता

देखूँ तो कहाँ तक वो तलत्तुफ़ नहीं करता आरे से अगर चीरे तो मैं उफ़ नहीं करता तम देते हो तकलीफ़ मुझे होती है राहत सच जानिए मैं इस में…

दस्त-ए-अदू से शब जो वो साग़र लिया किए

दस्त-ए-अदू से शब जो वो साग़र लिया किए किन हसरतों से ख़ून हम अपना पिया किए शुक्र-ए-सितम ने और भी मायूस कर दिया इस बात का वो गै़र से शिकवा…

आराम से है कौन जहान-ए-ख़राब में

आराम से है कौन जहान-ए-ख़राब में गुल सीना चाक और सबा इजि़्तराब में सब उस में महव और वो सब से अलाहिदा आईने में है आब न आईना आब में…