Category Archives: Mohammad Rafi ‘Souda’

आशिक़ की कहीं चश्मे-दुई बन न रहूँ मैं

आशिक़ की कहीं चश्मे-दुई बन न रहूँ मैं मैं रख़्न-ए-किश्ती हूँ, रोऊँ और बहूँ मैं प्यारे न बुरा मानो तो एक बात कहूँ मैं किस लुत्फ़ की उम्मीद पे ये…

तुझ बिन ब-चमन हर-ख़सो-हर-ख़ार परीशाँ

तुझ बिन ब-चमन हर-ख़सो-हर-ख़ार परीशाँ हैरान है नरगिस, गुलो-गुलज़ार परीशाँ गह कुफ़्र का माइल है ये दिल, गह सुए-इस्लाम है दर-तलब सुबह-ओ-ज़ुन्नार परीशाँ मैं हाले-दिल इस वास्ते करता नहीं इज़हार…

सज्दा किया सनम को मैं दिल के कनिश्त में

सज्दा किया सनम को मैं दिल के कनिश्त में कह उस ख़ुदा से शैख़ जो है संगो-ख़िश्त में गुज़रा है आबे-चश्म मेरे सर से बारहा लेकिन न वो मिटा कि…

राज़े-दिल फ़ाश किया मैंने मिरी साक़ी पर

राज़े-दिल फ़ाश किया मैंने मिरी साक़ी पर कुछ न देखा मैं बजुज़ पर्दादरी शीशे में दिल में जिस रंग से ’सौदा’ के गुज़रती है लहर मौजै-मै कर न सके ज़ल्वागरी…

नातवाँ मुर्ग हूँ ऐ रुफ़्का-ए-परवाज़

नातवाँ मुर्ग हूँ ऐ रुफ़्का-ए-परवाज़ इतना आगे न बढ़ो तुम कि रहा जाता हूँ गर्मजोशी न करो मुझसे कि मानिंदे-चिनार अपनी ही आग में मैं आप जला जाता हूँ हूँ…

बात आवे न तो चुप रह कि गुमाँ के नज़दीक

बात आवे न तो चुप रह कि गुमाँ के नज़दीक सौ तरह का है सुख़न पर्द-ए-ख़ामोशी में भूलना हमको नहीं शर्त-ए-मुरव्वत कि हमें याद तेरी है दो आलम की फ़रामोशी…

न अश्क आँखों से बहते हैं, न दिल से उठती हैं आहें

न अश्क आँखों से बहते हैं, न दिल से उठती हैं आहें सबब क्या, कारवान-ए-दर्द की मसदूद हैं राहें न पहुँचा मंज़िले-मक़सूद को मजनूँ भी ऐ ’सौदा’ समझकर जाइयो, लुटती…

न ग़ुंचे गुल के खुलते हैं, न नरगिस की खिली कलियाँ

न ग़ुंचे गुल के खुलते हैं, न नरगिस की खिली कलियाँ चमन में लेके ख़मियाज़ा किसी ने अँखड़ियाँ मलियाँ कहीं मेहताब ने देखा है उस ख़ुरशीदे-ताबाँ को फिरे है ढूँढता…

समन्दर कर दिया नाम इसका सबने कह-कहकर

समन्दर कर दिया नाम इसका सबने कह-कहकर हुए थे जमा कुछ आँसू मेरी आँखों से बह-बहकर किसे ताक़त है शरहे-शौक़ उस मजलिस में करने की उठा देने के डर से…

न क़स्दे-काबा है दिल में, न अज़्मे-दैर बंदा हूँ

न क़स्दे-काबा है दिल में, न अज़्मे-दैर बंदा हूँ गले में डालकर रस्सी, जिधर चाहे उधर ले जा निहाल-आसा नहीं हैं ख़ुर्रमी माटी में ग़ुरबत के वतन से मुश्ते-ख़ाक ऐ…

जब बज़्म में बुताँ की वो रश्के-मह गया था

जब बज़्म में बुताँ की वो रश्के-मह गया था आपस में हर परी-रू मुँह देख रह गया था क्या-क्या दिला के ग़ैरत रक्खा में बाज़ दिल को वरना नसहनी बातें…

कोनैन तक मिले थी जिस दिल की मुझको क़ीमत

कोनैन तक मिले थी जिस दिल की मुझको क़ीमत क़िस्मत कि यक निगह पर जा उसको डाल आया बख़्शिश पे दो जहाँ की आई थी हिम्मत-ए-दहर लेकिन न याँ ज़बाँ…