Category Archives: Meer taqi meer

क्या कहूँ तुम से मैं के क्या है इश्क़

क्या कहूँ तुम से मैं के क्या है इश्क़ जान का रोग है, बला है इश्क़ इश्क़ ही इश्क़ है जहाँ देखो सारे आलम में भर रहा है इश्क़ इश्क़…

तुम नहीं फ़ितना-साज़ सच साहब

तुम नहीं फ़ितना-साज़ सच साहब शहर पुर-शोर इस ग़ुलाम से है कोई तुझसा भी काश तुझ को मिले मुद्दा हम को इन्तक़ाम से है शेर मेरे हैं सब ख़्वास पसंद…

शब् को वो पीए शराब निकला

शब् को वो पीए शराब निकला जाना ये कि आफ़्ताब निकला क़ुर्बाँ प्याला-ए-मै-नाब जैसे कि तेरा हिजाब निकला मस्ती में शराब की जो देखा आलम ये तमाम ख़्वाब निकला शैख़…

मुँह तका ही करे है जिस-तिस का

मुँह तका ही करे है जिस-तिस का हैरती है ये आईना किस का जाने क्या गुल खिलाएगी गुल-रुत ज़र्द चेह्रा है डर से नर्गिस का शाम ही से बुझा-सा रहता…

मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी

मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी कहाँ हम, कहाँ तुम, कहाँ फिर जवानी शिकायत करूँ हूँ तो सोने लगे है मेरी सर-गुज़िश्त अब हुई है कहानी अदा खींच सकता…

काबे में जाँबलब थे

काबे में जाँबलब थे हम दूरी-ए-बुताँ से आये हैं फिर के यारों अब के ख़ुदा के याँ से जब कौंधती है बिजली तब जानिब-ए-गुलिस्ताँ रखती है छेड़ मेरे ख़ाशाक-ए-आशियाँ से…

इस अहद में इलाही मोहब्बत् को क्या हुआ

इस अहद में इलाही मोहब्बत् को क्या हुआ छोड़ा वफ़ा को उन्ने मुरव्वत को क्या हुआ उम्मीदवार वादा-ए-दीदार मर चले आते ही आते यारों क़यामत को क्या हुआ बक्शिश ने…

जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा

जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा तो जीना हमें अपना दुशवार होगा ग़म-ए-हिज्र रखेगा बेताब दिल को हमें कुढ़ते-कुढ़ते कुछ आज़ार होगा जो अफ़्रात-ए-उल्फ़त है ऐसा तो आशिक़…

होती है अगर्चे कहने से

होती है अगर्चे कहने से यारों पराई बात पर हम से तो थमी न कभू मुँह पे आई बात कहते थे उस से मिलते तो क्या-क्या न कहते लेक वो…

दिल की बात कही नहीं जाती

दिल की बात कही नहीं जाती, चुप के रहना ठाना है हाल अगर है ऐसा ही तो जी से जाना जाना है सुर्ख़ कभू है आँसू होती ज़र्द् कभू है…

गुल को महबूब

गुल को महबूब में क़यास किया फ़र्क़ निकला बहोत जो बास किया दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना एक आलम से रू-शिनास किया कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन शौक़ ने…

दम-ए-सुबह बज़्म-ए-ख़ुश

दम-ए-सुबह बज़्म-ए-ख़ुश जहाँ शब-ए-ग़म से कम न थी मेहरबाँ कि चिराग़ था सो तो दर्द था जो पतंग था सो ग़ुबार था दिल-ए-ख़स्ता जो लहू हो गया तो भला हुआ…