Category Archives: Mahadevi verma

गीत-2

अलि अब सपने की बात– हो गया है वह मधु का प्रात! जब मुरली का मृदु पंचम स्वर, कर जाता मन पुलकित अस्थिर, कम्पित हो उठता सुख से भर, नव…

रुपसि तेरा घन-केश पाश

रुपसि तेरा घन-केश पाश! श्यामल श्यामल कोमल कोमल, लहराता सुरभित केश-पाश! नभगंगा की रजत धार में, धो आई क्या इन्हें रात? कम्पित हैं तेरे सजल अंग, सिहरा सा तन हे…

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में, प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में, प्रलय में मेरा पता पदचिन्ह जीवन…

विरह का जलजात जीवन,

विरह का जलजात जीवन, विरह का जलजात! वेदना में जन्म करुणा में मिला आवास; अश्रु चुनता दिवस इसका, अश्रु गिनती रात! जीवन विरह का जलजात! आँसुओं का कोष उर, दृगु…

ओ पागल संसार

ओ पागल संसार! माँग न तू हे शीतल तममय! जलने का उपहार! करता दीपशिखा का चुम्बन, पल में ज्वाला का उन्मीलन; छूते ही करना होगा जल मिटने का व्यापार! ओ…

कौन तुम मेरे हृदय में

कौन तुम मेरे हृदय में? कौन मेरी कसक में नित मधुरता भरता अलक्षित कौन प्यासे लोचनों में घुमड़ घिर झरता अपरिचित? स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा नींद के सूने निलय में? कौन…

श्रृंगार कर ले री सजनि

श्रृंगार कर ले री सजनि! नव क्षीरनिधि की उर्म्मियों से रजत झीने मेघ सित, मृदु फेनमय मुक्तावली से तैरते तारक अमित; सखि! सिहर उठती रश्मियों का पहिन अवगुण्ठन अवनि! हिम-स्नात…

आज क्यों तेरी वीणा मौन?

आज क्यों तेरी वीणा मौन? शिथिल शिथिल तन थकित हुए कर, स्पन्दन भी भूला जाता उर, मधुर कसक सा आज हृदय में आन समाया कौन? आज क्यों तेरी वीणा मौन?…

तुम्हें बाँध पाती सपने में

तुम्हें बाँध पाती सपने में! तो चिरजीवन-प्यास बुझा लेती उस छोटे क्षण अपने में! पावस-घन सी उमड़ बिखरती, शरद-दिशा सी नीरव घिरती, धो लेती जग का विषाद ढुलते लघु आँसू-कण…

पुलक पुलक उर, सिहर सिहर तन,

पुलक पुलक उर, सिहर सिहर तन, आज नयन आते क्यों भर-भर! सकुच सलज खिलती शेफाली, अलस मौलश्री डाली डाली; बुनते नव प्रवाल कुंजों में, रजत श्याम तारों से जाली; शिथिल…

धीरे धीरे उतर क्षितिज से

धीरे धीरे उतर क्षितिज से आ वसन्त-रजनी! तारकमय नव वेणीबन्धन शीश-फूल कर शशि का नूतन, रश्मि-वलय सित घन-अवगुण्ठन, मुक्ताहल अभिराम बिछा दे चितवन से अपनी! पुलकती आ वसन्त-रजनी! मर्मर की…

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर!

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर! दुख से आविल सुख से पंकिल, बुदबुद् से स्वप्नों से फेनिल, बहता है युग-युग अधीर! जीवन-पथ का दुर्गमतम तल अपनी गति से कर सजल सरल,…