Category Archives: Mahadevi verma

आज तार मिला चुकी हूँ।

आज तार मिला चुकी हूँ। सुमन में संकेत-लिपि, चंचल विहग स्वर-ग्राम जिसके, वात उठता, किरण के निर्झर झुके, लय-भार जिसके, वह अनामा रागिनी अब साँस में ठहरा चुकी हूँ! सिन्धु…

हुए शूल अक्षत मुझे धूलि चन्दन

हुए शूल अक्षत मुझे धूलि चन्दन! अगरु धूम-सी साँस सुधि-गन्ध-सुरभित, बनी स्नेह-लौ आरती चिर-अकम्पित, हुआ नयन का नीर अभिषेक-जल-कण! सुनहले सजीले रँगीले धबीले, हसित कंटकित अश्रु-मकरन्द-गीले, बिखरते रहे स्वप्न के…

सब बुझे दीपक जला लूं

सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम आज दीपक रागिनी जगा लूं क्षितिज कारा तोडकर अब गा उठी उन्मत आंधी, अब घटाओं में न रुकती लास तन्मय तडित बांधी,…

प्राण हँस कर ले चला जब

प्राण हँस कर ले चला जब चिर व्यथा का भार उभर आये सिन्धु उर में वीचियों के लेख, गिरि कपोलों पर न सूखी आँसुओं की रेख धूलि का नभ से…

ओ चिर नीरव

पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला! घेर ले छाया अमा बन, आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन, और होंगे नयन सूखे, तिल बुझे औ’ पलक रूखे,…

पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला

पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला घेर ले छाया अमा बन आज कंजल-अश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन और होंगे नयन सूखे तिल बुझे औ’ पलक रूखे…

दीप मेरे जल अकम्पित

दीप मेरे जल अकम्पित, घुल अचंचल! सिन्धु का उच्छवास घन है, तड़ित, तम का विकल मन है, भीति क्या नभ है व्यथा का आँसुओं से सिक्त अंचल! स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,…

हे मेरे चिर सुन्दर-अपने!

हे मेरे चिर सुन्दर-अपने! भेज रही हूँ श्वासें क्षण क्षण, सुभग मिटा देंगी पथ से यह तेरे मृदु चरणों का अंकन ! खोज न पाऊँगी, निर्भय आओ जाओ बन चंचल सपने!…

क्या तिमिर कह जाता करुण?

क्या तिमिर कह जाता करुण? क्या मधुर दे जाती किरण? किस प्रेममय दुख से हृदय में अश्रु में मिश्री घुली? किस मलय-सुरभित अंक रह- आया विदेशी गन्धवह? उन्मुक्त उर अस्तित्व…

शलभ मैं शापमय वर हूँ!

शलभ मैं शापमय वर हूँ! किसी का दीप निष्ठुर हूँ! ताज है जलती शिखा चिनगारियाँ श्रृंगारमाला; ज्वाल अक्षय कोष सी अंगार मेरी रंगशाला; नाश में जीवित किसी की साध सुन्दर…

विरह की घडियाँ हुई अलि मधुर मधु की यामिनी सी!

विरह की घडियाँ हुई अलि मधुर मधु की यामिनी सी! दूर के नक्षत्र लगते पुतलियों से पास प्रियतर, शून्य नभ की मूकता में गूँजता आह्वान का स्वर, आज है नि:सीमता…

रे पपीहे पी कहाँ

रे पपीहे पी कहाँ? खोजता तू इस क्षितिज से उस क्षितिज तक शून्य अम्बर, लघु परों से नाप सागर; नाप पाता प्राण मेरे प्रिय समा कर भी कहाँ? हँस डुबा…