Category Archives: bahadur shah zafar

न तो कुछ कुफ़्र है, न दीं कुछ है

न तो कुछ कुफ़्र है, न दीं कुछ है है अगर कुछ, तेरा यकीं कुछ है है मुहब्बत जो हमनशीं कुछ है और इसके सिवा नहीं कुछ है दैरो-काबा में…

होते होते चश्म से आज अश्क-बरी रह गई

होते होते चश्म से आज अश्क-बरी रह गई आबरू बारे तेरी अब्र-ए-बहारी रह गई. आते आते इस तरफ़ उन की सवारी रह गई दिल की दिल में आरज़ू-ए-जाँ-निसारी रह गई.…

कहीं मैं गुंचा हूँ, वाशुद से अपने ख़ुद परीशां हूँ

कहीं मैं गुंचा हूँ, वाशुद से अपने ख़ुद परीशां हूँ कहीं गौहर हूँ, अपनी मौज़ में मैं आप ग़लतां हूँ कहीं मैं साग़रे-गुल हूँ, कहीं मैं शीशा-ए-मुल हूँ कहीं मैं…

रात भर मुझको गम-ए-यार ने सोने न दिया

रात भर मुझको गम-ए-यार ने सोने न दिया सुबह को खौफे शबे तार न सोने न दिया शम्अ की तरह मुझे रात कटी सूली पर चैन से यादे कदे यार…

हवा में फिरते हो हिर्स-ओ-हूं-हा के लिए

हवा में फिरते हो हिर्स-ओ-हूं-हा के लिए गुरूर छोड़ दो ऐ गाफिलों, खुदा के लिए गिरा दिया है हमें किसने चाहे-उल्फत में हम आप डूबें किसी अपने आशना के लिए…

इक दम में जर्बे-नाला से पत्थर को तोड़ दूं

इक दम में जर्बे-नाला से पत्थर को तोड़ दूं पत्थर तो क्या, किसी सद्दे-सिकन्दर को तोड़ दूं खूने-जिगर से लाल का भी मोल दूं बहा गर आंसुओं से कीमते-गौहर को…

जलाया आप हमने, जब्त कर-कर आहे-सोजां को

जलाया आप हमने, जब्त कर-कर आहे-सोजां को जिगर को, सीना को, पहलू को, दिल को, जिस्म को, जां को हमेशा कुंजे-तन्हाई में मूनिस हम समझते है अलम को, यास को, हसरत को, बेताबी को, हुरमां…

शब, हाथ हमारे जो मये-नाब न आई

शब, हाथ हमारे जो मये-नाब न आई कैफियते-शे‘रे शबे-महताब न आई सहरा में घटाघोर पे, हम बादकशों की कब आई कि बा-दीदा-ए-पुरआब न आई जो मुल्के-अदम से नहीं आया कोई हमदम क्या याद उसे सोहबते-अहबाब न आई…

या मुझे अफसरे-शाहाना बनाया होता

या मुझे अफसरे-शाहाना बनाया होता या मुझे ताज-गदायाना बनाया होता खाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे काश, खाके-दरे-जनाना बनाया होता नशा-ए-इश्क का गर जर्फ दिया था मुझको उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता…

ऐश से गुजरी कि गम के साथ, अच्छी निभ गई

ऐश से गुजरी कि गम के साथ, अच्छी निभ गई निभ गई जो उस सनम के साथ, अच्छी निभ गई दोस्ती उस दुश्मने-जां ने निबाही तो सही जो निभी जुल्मो-सितम…

रविश-ए-गुल है कहां यार हंसाने वाले

रविश-ए-गुल है कहां यार हंसाने वाले हमको शबनम  की तरह सब है रूलाने वाले सोजिशे-दिल का नहीं अश्क बुझाने वाले बल्कि हैं और भी यह आग लगाने वाले मुंह पे सब जर्दी-ए-रूखसार कहे देती…

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में 

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में…