Category Archives: Zauq

ज़ख़्मी हूँ तेरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से

ज़ख़्मी हूँ तेरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से जाने का नहीं चोर मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर से हम ख़ूब हैं वाक़िफ़ तेरे अंदाज़-ए-कमर से ये तार निकलता है कोई दिल के गोहर से फिर आए…

वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता

वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता पर मेरा जिगर देख के मैं उफ़ नहीं करता क्या क़हर है वक़्फ़ा है अभी आने में उस के और दम…

ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है

ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है ज़िन्दगी मौत के आने की ख़बर देती है ज़ाल-ए-दुन्या है अजब तरह की अल्लामा-ए-दहर मर्द-ए-दीं-दार को भी दहरिया कर देती है बढ़ती जाती है…

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें ऎसी हैं जैसे ख़्वाब की बातें फिर मुझे ले चला उधर देखो दिल-ए-ख़ाना-ख़राब की बातें वाइज़ा छोड़ ज़िक्र-ए-नेमत-ए-ख़ुल्द कह शराब ओ कबाब की बातें मह-जबीं याद…

उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है

उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है वो अपनी जा-नमाज़ है और ये नमाज़ है ना-साज़ है जो हम से उसी से ये साज़ है क्या ख़ूब दिल है वाह हमें जिस…

तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैं

तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैं सब्र ओ ताक़त के वहाँ पाँव उखड़ जाते हैं इतने बिगड़े हैं वो मुझ से के अगर नाम उन के ख़त भी…

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है कौन फिरता है ये मुरदार लिए फिरती है घर से बाहर न निकलता कभी अपने ख़ुर्शीद हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार लिए फिरती है वो…

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू तुझ को पराई क्या पड़ी अपनी नबेड़ तू नाख़ुन ख़ुदा न दे तुझे ऐ पंजा-ए-जुनूँ देगा तमाम अक़्ल के बख़िये उधेड़ तू इस सैद-ए-मुज़्तरिब…

क़ुफ़्ल-ए-सद-ख़ाना-ए-दिल आया जो तू टूट गए

क़ुफ़्ल-ए-सद-ख़ाना-ए-दिल आया जो तू टूट गए जो तिलिस्मात न टूटे थे कभू टूट गए सैकड़ों कासा सर-ए-दहर में मानिंद-ए-हुबाब कभू ऐ चर्ख़ बने तुझ से कभू टूट गए टाँके क्या…

क़स्द जब तेरी ज़ियारत का कभू करते हैं

क़स्द जब तेरी ज़ियारत का कभू करते हैं चश्म-ए-पुर-आब से आईने वज़ू करते हैं करते इज़हार हैं दर-पर्दा अदावत अपनी वो मेरे आगे जो तारीफ़-ए-अदू करते हैं दिल का ये…

नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा

नीमचा यार ने जिस वक़्त बग़ल में मारा जो चढ़ा मुँह उसे मैदान-ए-अजल में मारा माल जब उस ने बहुत रद्द-ओ-बदल में मारा हम ने दिल अपना उठा अपनी बग़ल…

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए के साथ औज के पस्ती है आसमाँ के लिए हज़ार लुत्फ़ हैं जो हर सितम में जाँ के लिए सितम-शरीक हुआ कौन आसमाँ के लिए…