Category Archives: Zafar Gorakhpuri

धूप क्या है और साया क्या है

धूप क्या है और साया क्या है अब मालूम हुआ ये सब खेल तमाशा क्या है अब मालूम हुआ हँसते फूल का चेहरा देखूँ और भर आई आँख अपने साथ…

देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे

देखें क़रीब से भी तो अच्छा दिखाई दे इक आदमी तो शहर में ऐसा दिखाई दे अब भीक मांगने के तरीक़े बदल गए लाज़िम नहीं कि हाथ में कासा दिखाई दे…

दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में

दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में साया आते हुए डरता है मेरे कमरे में ग़म थका हारा मुसाफ़िर है चला जाएगा कुछ दिनों के लिए ठहरा है…

मैं क्या अगर अनफ़ास के सब तार

तो फिर मैं क्या अगर अनफ़ास के सब तार गुम उस में मेरे होने न होने के सभी आसार गुम उस में मेरी आँखों में इक मौसम हमेशा सब्ज़ रहता…

जो आए वो हिसाब-ए-आब-ओ-दाना

जो आए वो हिसाब-ए-आब-ओ-दाना करने वाले थे गए वो लोग जो कार-ए-ज़माना करने वाले थे उड़ाने के लिए कुछ कम नहीं है ख़ाक घर में भी वो मौसम ही नहीं…

जो अपनी है वो ख़ाक-ए-दिल-नशीनी

जो अपनी है वो ख़ाक-ए-दिल-नशीनी ही काम आएगी गिरोगे आसमाँ से जब ज़मीं ही काम आएगी यहाँ से मत उठा बिस्तर के इस सफ़्फ़ाक आँधी में ये टूटी फूटी दीवार-ए-यक़ीं…

जिस्म छूती है जब आ आ के पवन बारिश में

जिस्म छूती है जब आ आ के पवन बारिश में और बढ़ जाती है कुछ दिल की जलन बारिश में मेरे अतराफ़ छ्लक पड़ती हैं मीठी झीलें जब नहाता है…

ज़मीं, फिर दर्द का ये सायबां कोई नहीं देगा

ज़मीं, फिर दर्द का ये सायबां कोई नहीं देगा तुझे ऐसा कुशादा आसमां कोई नहीं देगा अभी ज़िंदा हैं, हम पर ख़त्म कर ले इम्तिहाँ सारे हमारे बाद कोई इम्तिहां,…

जब मेरी याद सताए तो मुझे ख़त लिखना

जब मेरी याद सताए तो मुझे ख़त लिखना । तुम को जब नींद न आए तो मुझे ख़त लिखना ।। नीले पेड़ों की घनी छाँव में हँसता सावन, प्यासी धरती…

जब इतनी जाँ से मोहब्बत बढ़ा के रक्खी थी

जब इतनी जाँ से मोहब्बत बढ़ा के रक्खी थी तो क्यूँ करीब-ए-हवा शम्मा ला के रक्खी थी फ़लक ने भी न ठिकाना कहीं दिया हम को मकाँ की नीव ज़मीं…

चेहरा लाला-रंग हुआ है मौसम-ए-रंज-ओ-मलाल के बाद

चेहरा लाला-रंग हुआ है मौसम-ए-रंज-ओ-मलाल के बाद हम ने जीने का गुर जाना ज़हर के इस्तिमाल के बाद किस को ख़बर थी मुख़्तारी में होंगे वो इतने मजबूर हम अपने…

कौन याद आया ये महकारें कहाँ से आ गईं

कौन याद आया ये महकारें कहाँ से आ गईं दश्त में ख़ुशबू की बौछारें कहाँ से आ गईं कैसी शब है एक इक करवट पे कट जाता है जिस्म मेरे…