Category Archives: ‘Tabaa’ Abdul hai

यार रूठा है मेरा उस को मनाऊँ किस तरह

यार रूठा है मेरा उस को मनाऊँ किस तरह मिन्नतें कर पाँव पड़ उस के ले आऊँ किस तरह जब तलक तुम को न देखूँ तब तलक बे-चैन हूँ मैं…

तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है

तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है आह क्या चाहना ऐसा ही बुरा होता है तेरे अबरू से मेरा दिल न छुटेगा हरगिज़ गोश्त नाख़ून से भला कोई…

नहीं तुम मानते मेरा कहा जी

नहीं तुम मानते मेरा कहा जी कभी तो हम भी समझेंगे भला जी अचम्भा है मुझे बुलबुल के गुल बिन क़फ़स में किस तरह तेरा लगा जी तुम्हारे ख़त के…

नहीं कोई दोस्त अपना यार अपना मेहर-बाँ अपना

नहीं कोई दोस्त अपना यार अपना मेहर-बाँ अपना सुनाऊँ किस को ग़म अपना अलम अपना फ़ुग़ाँ अपना न ताक़त है इशारे की न कहने की न सुनने की कहूँ क्या…

मुझे ऐश ओ इशरत की क़ुदरत नहीं है

मुझे ऐश ओ इशरत की क़ुदरत नहीं है करूँ तर्क-ए-दुनिया तो हिम्मत नहीं है कभी ग़म से मुझ को फ़राग़त नहीं है कभी आह ओ नाले से फ़ुर्सत नहीं है…

ग़म में रोता हूँ तेरे सुब्ह कहीं शाम कहीं

ग़म में रोता हूँ तेरे सुब्ह कहीं शाम कहीं चाहने वाले को होता भी है आराम कहीं वस्ल हो वस्ल इलाही कि मुझे ताब नहीं दूर हूँ दूर मेरे हिज्र…

ग़ैर के हाथ में उस शोख़ का दामान है आज

ग़ैर के हाथ में उस शोख़ का दामान है आज मैं हूँ और हाथ मेरा और ये गिरेबान है आज लटपटी चाल खुले बाल ख़ुमारी अंखियाँ मैं तसद्दुक़ हूँ मेरी…

दिल-बर से दर्द-ए-दिल न कहूँ हाए कब तलक

दिल-बर से दर्द-ए-दिल न कहूँ हाए कब तलक ख़ामोश उस के ग़म में रहूँ हाए कब तलक उस शोख़ से जुदा मैं रहूँ हाए कब तलक ये ज़ुल्म ये सितम…

दाग़-ए-दिल अपना जब दिखाता हूँ

दाग़-ए-दिल अपना जब दिखाता हूँ रश्क से शम्मा को जलाता हूँ वो मेरा शोख़ है निपट चंचल भाग जाता है जब बुलाता हूँ उस परी-रू को देखता हूँ जब हो…