Category Archives: Nida Fazli

बेख़बरी

पड़ोसी के बच्चे को क्यों डाँटती हो शरारत तो बच्चों का शेवा रहा है बिचारी सुराही का क्या दोष इसमें कभी ताजा पानी भी ठण्डा हुआ है सहेली से बेकार…

इतनी पी जाओ

इतनी पी जाओ कि कमरे की सियह ख़ामोशी इससे पहले कि कोई बात करे तेज नोकीले सवालात करे इतनी पी जाओ कि दीवारों के बेरंग निशान इससे पहले कि कोई…

वक़्त से पहले

यूँ तो हर रिश्ते का अंज़ाम यही होता है फूल खिलता है महकता है बिखर जाता है तुमसे वैसे तो नहीं कोई शिकायत लेकिन- शाख हो सब्ज़ तो हस्सास फ़ज़ा…

दो सोचें

सुबह जब अख़बार ने मुझसे कहा ज़िन्दगी जीना बहुत दुश्वार है सरहदें फिर शोर-गुल करने लगीं ज़ंग लड़ने के लिए तैयार है दरमियाँ जो था ख़ुदा अब वो कहाँ आदमी…

तुमसे मिली नहीं है दुनिया

जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया बच्चों के स्कूल में शायद तुमसे मिली नहीं है दुनिया चार घरों के एक मुहल्ले के बाहर भी है आबादी…

एक तस्वीर

सुबह की धूप खुली शाम का रूप फ़ाख़्ताओं की तरह सोच में डूबे तालाब अज़नबी शहर के आकाश धुंधलकों की किताब पाठशाला में चहकते हुए मासूम गुलाब घर के आँगन…

दो नई खिड़कियाँ

आमने-सामने दो नई खिड़कियाँ जलती सिगरेट की लहराती आवाज में सुई-डोरे के रंगीन अल्फाज़ में मशवरा कर रहीं हैं कई रोज़ से शायद अब बूढ़े दरवाजे सिर जोड़कर वक़्त की…

खेल

आओ कहीं से थोड़ी सी मिट्टी भर लाएँ मिट्टी को बादल में गूँथें चाक चलाएँ नए-नए आकार बनाएँ किसी के सर पे चुटिया रख दें माथे ऊपर तिलक सजाएँ किसी…

किताबघर की मौत

ये रस्ता है वही तुम कह रहे हो यहाँ तो पहले जैसा कुछ नहीं है! दरख्तों पर न वो चालाक बन्दर परेशाँ करते रहते थे जो दिन भर न ताक़ों…

फ़क़त चन्द लम्हे

बहुत देर है बस के आने में आओ कहीं पास के लान पर बैठ जाएँ चटखता है मेरी भी रग-रग में सूरज बहुत देर से तुम भी चुप-चुप खड़ी हो…

मन बैरागी, तन अनुरागी

मन बैरागी, तन अनुरागी, कदम-कदम दुशवारी है जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फनकारी है औरों जैसे होकर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में कुछ लोगों का सीधापन है,…

एक लुटी हुई बस्ती की कहानी

बजी घंटियाँ  ऊँचे मीनार गूँजे सुनहरी सदाओं ने उजली हवाओं की पेशानियों की रहमत के बरकत के पैग़ाम लिक्खे— वुजू करती तुम्हें खुली कोहनियों तक मुनव्वर हुईं— झिलमिलाए अँधेरे –भजन…