Category Archives: Harivansh Rai Bacchan

मरण काले

(निराला के मृत शरीर का चित्र देखने पर) मरामैंने गरुड़ देखा,गगन का अभिमान,धराशायी,धूलि धूसर,म्लान! मरामैंने सिंह देखा,दिग्दिगंत दहाड़ जिसकी गूँजती थी,एक झाड़ी में पड़ा चिर-मूक,दाढ़ी-दाढ़ चिपका थूक. मरा मैंने सर्प देखा,स्फूर्ति…

दो चित्र

–यह कि तुम जिस ओर जाओ चलूँ मैं भी,यह कि तुम जो राह थामो रहूँ थामे हुए मैं भी,यह कि कदमों से तुम्हारे कदम अपना मैं मिलाए रहूँs…यह कि तुम खींचो जिधर को खिंचूं,जिससे…

तीसरा हाथ

एक दिन कातर ह्रदय से,करूण स्वर से,और उससे भी अधिक डब-डब दृगों से,था कहा मैंने कि मेरा हाथ पकड़ोक्योंकि जीवन पंथ के अब कष्ट एकाकी नहीं जाते सहे. और तुम भी तो किसी से यही…

पानी मारा एक मोती

आदमी:– जा चुका है,मर चुका है,मोतियों का वह सुभग पानी कि जिसकी मरजियों से सुन कहानी,उल्लसित-मन,उर्ज्वसित-भुज,सिंधु कि विक्षुब्ध लहरे चीरजल गंभीर में सर-सर उतरता निडर पहुँचा था अतल तक;सीपियों को फाड़,मुक्ता-परस-पुलकित,भाग्य-धन को मुठ्ठियों…

बुद्ध के साथ एक शाम

रक्तरंजित साँझ के आकाश का आधार लेकर एक पत्रविहीन तरुकंकाल-सा आगे खड़ा है.टुनगुनी पर नीड़ शायद चील का,खासा बड़ा है. एक मोटी डाल पर हैएक भारी चील बैठी एक छोटी चिड़ी पंजों से…

दैत्‍य की देन

सरलता से कुछ नहीं मुझको मिला है,जबकि चाहा है कि पानी एक चुल्लू पिऊँ,मुझको खोदना कूआँ पड़ा है.एक कलिका जो उँगलियों में पकड़ने को मुझे वन एक पूरा कंटकों काकाटकर के पार करना…

कलश और नींव का पत्‍थर

अभी कल ही पंचमहले पर कलश था,औरचौमहले,तिमहले,दुमहले से खिसकता अब हो गया हूँ नींव का पत्थर ! काल ने धोखा दिया,या फिर दिशा ने,या कि दोनों में विपर्यय;एक ने ऊपर चढ़ाया,दूसरे ने खींच नीचे को गिराया,अवस्था…

स्‍वाध्‍याय कक्ष में वसंत

शहर का,फिर बड़े,तिसपर दफ्तरी जीवन–कि बंधन करामाती–जो कि हर दिन (छोड़कर इतवार को,सौ शुक्र है अल्लामियाँ का,आज को आराम वे फ़रमा गए थे)सुबह को मुर्गा बनाकर है उठाता,एक ही रफ़्तार-ढर्रे पर…

ध्‍वस्‍त पोत

बंद होना चाहिए,यह तुमुल कोलाहल,करुण चीत्कार ,हाय पुकार,कर्कश-क्रुद्ध-स्वर आरोपबूढ़े नाविकों पर,श्वेतकेशी कर्णधारों पर,कि अपनी अबलता से,ग़लतियों से,या कि गुप्त स्वार्थप्रेरित,तीर्थयात्रा पर चला यह पोतलाकर के उन्हें इस विकट चट्टान से टकरा…

आज़ादी के चौदह वर्ष

देश के बेपड़े,भोले,दीन लोगों !आज चौदह साल से आज़ाद हो तुम.कुछ समय की माप का आभास तुमको ?नहीं; तो तुम इस तरह समझो कि जिस दिन तुम हुए स्वाधीन उस दिन राम यदि मुनि-वेष…

राष्‍ट्र-पिता के समक्ष

हे महात्मन,हे महारथ,हे महा सम्राट !हो अपराध मेरा क्षम्य,मैं तेरे महाप्रस्थान की कर याद,या प्रति दिवस तेरा मर्मभेदी,दिल कुरेदी,पीर-टिकट अभाव अनुभव कर नहींतेरे समक्ष खड़ा हुआ हूँ.धार कर तन —राम को क्या, कृष्ण…

रुपैया.

(उत्तरप्रदेश के लोकधुन पर आधारित)           आज मँहगा है,सैंया,रुपैया.रोटी न मँहगी है,लहँगा न मँहगा,          मँहगा है,सैंया,रुपैया.          आज मँहगा है,सैंया,रुपैया.बेटी न प्यारी है, बेटा न प्यारा,          प्यारा है,सैंया,रुपैया.          मगर मँहगा है,सैंया,रुपैया.नाता न साथी है,रिश्ता न साथी           साथी है,सैंया,रुपैया.          मगर…