Category Archives: Harivansh Rai Bacchan

मेरा तन भूखा, मन भूखा!

मेरा तन भूखा, मन भूखा! इच्छा, सब सत्यों का दर्शन, सपने भी छोड़ गये लोचन! मेरे अपलक युग नयनों में मेरा चंचल यौवन भूखा! मेरा तन भूखा, मन भूखा! इच्छा,…

कोई गाता, मैं सो जाता!

कोई गाता, मैं सो जाता! संसृति के विस्तृत सागर पर सपनों की नौका के अंदर सुख-दुख की लहरों पर उठ-गिर बहता जाता मैं सो जाता! कोई गाता मैं सो जाता!…

मूल्य दे सुख के क्षणों का

मूल्य दे सुख के क्षणों का! एक पल स्वच्छंद होकर तू चला जल, थल, गगन पर, हाय! आवाहन वही था विश्व के चिर बंधनों का! मूल्य दे सुख के क्षणों…

मेरे उर पर पत्थर धर दो!

मेरे उर पर पत्थर धर दो! जीवन की नौका का प्रिय धन लुटा हुआ मणि-मुक्ता-कंचन तो न मिलेगा, किसी वस्तु से इन खाली जगहों को भर दो! मेरे उर पर…

अब मत मेरा निर्माण करो

अब मत मेरा निर्माण करो! तुमने न बना मुझको पाया, युग-युग बीते, मैं न घबराया; भूलो मेरी विह्वलता को, निज लज्जा का तो ध्यान करो! अब मत मेरा निर्माण करो!…

एकांत-संगीत

तट पर है तरुवर एकाकी, नौका है, सागर में, अंतरिक्ष में खग एकाकी, तारा है, अंबर में, भू पर वन, वारिधि पर बेड़े, नभ में उडु खग मेला, नर नारी…

लहरों का निमंत्रण

तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण ! :१: रात का अंतिम प्रहर है, झिलमिलाते हैं सितारे , वक्ष पर युग बाहु बाँधे मैं खड़ा सागर किनारे, वेग से…

पथभ्रष्ट

है कुपथ पर पाँव मेरे आज दुनिया की नज़र में ! :१: पार तम के दीख पड़ता एक दीपक झिलमिलाता, जा रहा उस ओर हूँ मैं मत्त-मधुमय गीत गता, इस कुपथ…

कवि का गीत

गीत कह इसको न दुनियाँ यह दुखों की माप मेरे ! :१: काम क्या समझूँ न हो यदि गाँठ उर की खोलने को ? संग क्या समझूँ किसी का हो न मन…

कवि की वासना

कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा! १ सृष्टि के प्रारंभ में मैने उषा के गाल चूमे, बाल रवि के भाग्य वाले दीप्त भाल विशाल चूमे, प्रथम संध्या के…

मधुकलश

है आज भरा जीवन मुझमें, है आज भरी मेरी गागर ! :१: सर में जीवन है, इससे ही वह लहराता रहता प्रतिपल, सरिता में जीवन,इससे ही वह गाती जाती है कल-कल…

पगध्वनि

पहचानी वह पगध्वनि मेरी , वह पगध्वनि मेरी पहचानी ! १. नन्दन वन में उगने वाली , मेंहदी जिन चरणों की लाली , बनकर भूपर आई, आली मैं उन तलवों से…