Category Archives: ‘Fanaa’ Nizami Kaanpuri

मेरे चेहरे से ग़म का आश्कारा नहीं

मेरे चेहरे से ग़म का आश्कारा नहीं ये न समझो कि मैं ग़म का मारा नहीं चश्म-ए-साक़ी पे भी हक हमारा नहीं अब ब-जुज़ तर्क-ए-मय कोई चारा नहीं बहर-ए-गम़ में…

इक तिश्ना-लब ने बढ़ कर जो साग़र उठा लिया

इक तिश्ना-लब ने बढ़ कर जो साग़र उठा लिया हर बु-उल-हवस ने मय-कदा सर पर उठा लिया मौजों के इत्तिहादद का आलम ने पूछिए क़तरा उठा और उठ के समंदर…

हुस्न का एक आह ने चेहरा निढाल कर दिया

हुस्न का एक आह ने चेहरा निढाल कर दिया आज तो ऐ दिल-ए-हज़ीं तू ने कमाल कर दिया सहता रहा जफ़ा-ए-दोस्त कहता रहा अदा-ए-दोस्त मेरे ख़ुलूस ने मेरा जीना मुहाल…

हम आगही इश्क़ का अफ़्साना कहेंगे

हम आगही इश्क़ का अफ़्साना कहेंगे कुछ अक़्ल के मारे हमें दीवाना कहेंगे रहता है वहाँ ज़िक्र-ए-तुहूर ओ मय-ए-कौसर हम आज से काबा को भी मय-ख़ाना कहेंगे उनवान बदल देंगे…

डूबने वाले की मय्यत पर लाखों रोने वाले हैं

डूबने वाले की मय्यत पर लाखों रोने वाले हैं फूट फूट कर जो रोते हैं वही डूबने वाले हैं किस किस को तुम भूल गए हो ग़ौर से देखो बादा-कशी…

चेहरा-ए-सुब्ह नज़र आया रूख़-ए-शाम के बाद

चेहरा-ए-सुब्ह नज़र आया रूख़-ए-शाम के बाद सब को पहचान लिया गर्दिश-ए-अय्याम के बाद मिल गई राह-ए-यक़ीं मंज़िल-ए-औहाम के बाद जलवे ही जलवे नज़र आए दर ओ बाम के बाद चाहिए…

मुझे प्यार से तेरा देखना मुझे छुप छुपा के वो देखना

मुझे प्यार से तेरा देखना मुझे छुप छुपा के वो देखना मेरा सोया जज़्बा उभारना तुम्हें याद हो की न याद हो रह ओ रस्म क़ल्ब ओ निगाह के वो…

ज़ुल्मत-ए-शाम से भी नूर-ए-सहर पैदा कर

ज़ुल्मत-ए-शाम से भी नूर-ए-सहर पैदा कर क़ल्ब शबनम का सितारों की नज़र पैदा कर फिर किसी दामन-ए-रंगीं की तरफ़ आँख उठा पहले अश्कों के लिए दीद-ए-तर पैदा कर रह-ए-दुश्वार में…

यूँ तेरी तलाश में तेरे ख़स्ता-जाँ चले

यूँ तेरी तलाश में तेरे ख़स्ता-जाँ चले जैसे झूम झूम कर गर्द-ए-कारवाँ चले आज यूँ ही साक़िया जाम-ए-अर्ग़ुवाँ चले जैसे बज़्म-ए-वाज़ में शैख़ की ज़ुबाँ चले राह-ए-ग़म में हम से…

ये बहार का ज़माना ये हसीं गुलों के साए

ये बहार का ज़माना ये हसीं गुलों के साए मुझे डर है बाग़-बाँ को कहीं नींद आ न जाए तेरे वादों पर कहाँ तक मेरा दिल फ़रेब खाए कोई ऐसा…

वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्म-सार हुआ

वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्म-सार हुआ सुना के अपनी ग़ज़ल मैं क़ुसूर-वार हुआ हज़ार बार वो गुज़रा है बे-नियाज़ाना न जाने क्यूँ मुझे अब के ही ना-गवार हुआ हज़ारों हाथ…