Tag Archives: urdu poetry

न जी भर के देखा न कुछ बात की

न जी भर के देखा न कुछ बात की बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की उजालों की परियाँ…

क्या कहिये किस तरह से जवानी गुज़र गई

क्या कहिये किस तरह से जवानी गुज़र गई बदनाम करने आई थी बदनाम कर गई । क्या क्या रही सहर को शब-ए-वस्ल की तलाश कहता रहा अभी तो यहीं थी…

लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है

लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है रंज भी इतने उठाए हैं कि जी जानता है जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने तूने दिल इतने दुखाए…

फिरे राह से वो यहाँ आते आते

फिरे राह से वो यहाँ आते आते अजल मेरी रही तू कहाँ आते आते मुझे याद करने से ये मुद्दा था निकल जाए दम हिचकियां आते आते कलेजा मेरे मुंह…

डरते हैं चश्म-ओ-ज़ुल्फ़

डरते हैं चश्म-ओ-ज़ुल्फ़, निगाह-ओ-अदा से हम हर दम पनाह माँगते हैं हर बला से हम माशूक़ जाए हूर मिले, मय बजाए आब महशर में दो सवाल करेंगे ख़ुदा से हम…

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई…

रू-ए- अनवर नहीं देखा जाता

रू-ए- अनवर नहीं देखा जाता देखें क्योंकर नहीं देखा जाता रश्के-दुश्मन भी गवारा लेकिन तुझको मुज़्तर नहीं देखा जाता दिल में क्या ख़ाक उसे देख सके जिसको बाहर नहीं देखा जाता तौबा के बाद…

कहीं मैं गुंचा हूँ, वाशुद से अपने ख़ुद परीशां हूँ

कहीं मैं गुंचा हूँ, वाशुद से अपने ख़ुद परीशां हूँ कहीं गौहर हूँ, अपनी मौज़ में मैं आप ग़लतां हूँ कहीं मैं साग़रे-गुल हूँ, कहीं मैं शीशा-ए-मुल हूँ कहीं मैं…

रात भर मुझको गम-ए-यार ने सोने न दिया

रात भर मुझको गम-ए-यार ने सोने न दिया सुबह को खौफे शबे तार न सोने न दिया शम्अ की तरह मुझे रात कटी सूली पर चैन से यादे कदे यार…

इक दम में जर्बे-नाला से पत्थर को तोड़ दूं

इक दम में जर्बे-नाला से पत्थर को तोड़ दूं पत्थर तो क्या, किसी सद्दे-सिकन्दर को तोड़ दूं खूने-जिगर से लाल का भी मोल दूं बहा गर आंसुओं से कीमते-गौहर को…

शब, हाथ हमारे जो मये-नाब न आई

शब, हाथ हमारे जो मये-नाब न आई कैफियते-शे‘रे शबे-महताब न आई सहरा में घटाघोर पे, हम बादकशों की कब आई कि बा-दीदा-ए-पुरआब न आई जो मुल्के-अदम से नहीं आया कोई हमदम क्या याद उसे सोहबते-अहबाब न आई…

या मुझे अफसरे-शाहाना बनाया होता

या मुझे अफसरे-शाहाना बनाया होता या मुझे ताज-गदायाना बनाया होता खाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे काश, खाके-दरे-जनाना बनाया होता नशा-ए-इश्क का गर जर्फ दिया था मुझको उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता…