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दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में

दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में साया आते हुए डरता है मेरे कमरे में ग़म थका हारा मुसाफ़िर है चला जाएगा कुछ दिनों के लिए ठहरा है…

कितनी सदियों से ढूँढ़ती होंगी

कितनी सदियों से ढूँढ़ती होंगी तुमको ये चाँदनी की आवज़ें पूर्णमासी की रात जंगल में नीले शीशम के पेड़ के नीचे बैठकर तुम कभी सुनो जानम भीगी-भीगी उदास आवाज़ें नाम…

ज़मीं से आँच ज़मीं तोड़कर निकलती है

ज़मीं से आँच ज़मीं तोड़कर निकलती है अजीब तिश्नगी इन बादलों से बरसी है मेरी निगाह मुख़ातिब से बात करते हुए तमाम जिस्म के कपड़े उतार लेती है सरों पे…

चल मुसाफ़िर बत्तियाँ जलने लगीं 

चल मुसाफ़िर बत्तियाँ जलने लगीं आसमानी घंटियाँ बजने लगीं दिन के सारे कपड़े ढीले हो गए रात की सब चोलियाँ कसने लगीं डूब जायेंगे सभी दरिया पहाड़ चांदनी की नद्दियाँ…

उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर

उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर नीले बादल के इक गाँव में जायेंगे धूप माथे पे अपने सजा लायेंगे साये पलकों के पीछे छुपा लायेंगे बर्फ पर तैरते रोशनी…

सब्ज़ पत्ते धूप की ये आग जब पी जाएँगे

सब्ज़ पत्ते धूप की ये आग जब पी जाएँगे उजले फर के कोट पहने हल्के जाड़े आएँगे गीले-गीले मंदिरों में बाल खोले देवियाँ सोचती हैं उनके सूरज देवता कब आएँगे…

ख़ुश्बू को तितलियों के परों में छिपाऊँगा

ख़ुश्बू को तितलियों के परों में छिपाऊँगा फिर नीले-नीले बादलों में लौट जाऊँगा सोने के फूल-पत्ते गिरेंगे ज़मीन पर मैं ज़र्द-ज़र्द शाख़ों पे जब गुनगुनाऊँगा घुल जायेंगी बदन पे जमी…

रात चुपचाप दबे पाँव

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं कांच का नीला सा गुम्बद है, उड़ा जाता है ख़ाली-ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता…

सुला चुकी थी ये दुनिया मुझे

सुला चुकी थी ये दुनिया थपक थपक के मुझे जगा दिया तेरी पाज़ेब ने खनक के मुझे कोई बताये के मैं इसका क्या इलाज करूँ परेशां करता है ये दिल…

हंगामे रात के

  हम आ गए चूँकि हंगामे में रात के ले आये क्या-क्या दरया से रात के रात के परदे में है वो छिपा हुआ गवाह दिन भला बराबर में है…

सर से चादर बदन से क़बा ले गई

सर से चादर बदन से क़बा ले गई ज़िन्दगी हम फ़क़ीरों से क्या ले गई मेरी मुठ्ठी में सूखे हुए फूल हैं ख़ुशबुओं को उड़ा कर हवा ले गई मैं…

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते किसी की आँख में रहकर संवर गए होते सिंगारदान में रहते हो आईने की तरह किसी के हाथ से गिरकर बिखर गए…