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हंगामे रात के

  हम आ गए चूँकि हंगामे में रात के ले आये क्या-क्या दरया से रात के रात के परदे में है वो छिपा हुआ गवाह दिन भला बराबर में है…

सर से चादर बदन से क़बा ले गई

सर से चादर बदन से क़बा ले गई ज़िन्दगी हम फ़क़ीरों से क्या ले गई मेरी मुठ्ठी में सूखे हुए फूल हैं ख़ुशबुओं को उड़ा कर हवा ले गई मैं…

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते किसी की आँख में रहकर संवर गए होते सिंगारदान में रहते हो आईने की तरह किसी के हाथ से गिरकर बिखर गए…

दूसरों को हमारी सज़ाएँ न दे

दूसरों को हमारी सज़ाएँ न दे चांदनी रात को बददुआएँ न दे फूल से आशिक़ी का हुनर सीख ले तितलियाँ ख़ुद रुकेंगी सदाएँ न दे सब गुनाहों का इकरार करने…

मेरे दिल की राख कुरेद मत

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्करा के हवा न दे ये चराग़ फिर भी चराग़ है कहीं तेरा हाथ जला न दे मैं उदासियाँ न सजा सकूँ कभी…

एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं 

एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं…

निकल आये इधर जनाब कहाँ 

निकल आये इधर जनाब कहाँ रात के वक़्त आफ़ताब कहाँ सब खिले हैं किसी के आरिज़ पर इस बरस बाग़ में गुलाब कहाँ मेरे होंठों पे तेरी ख़ुश्बू है छू…

याद किसी की चांदनी बन कर कोठे-कोठे छिटकी है

याद किसी की चांदनी बन कर कोठे-कोठे छिटकी है याद किसी की धूप हुई है ज़ीना-ज़ीना उतरी है रात की रानी सहने-चमन में गेसू खोले सोती है रात बॆ रात…

हमारे हाथों में इक शक़्ल चाँद जैसी थी 

हमारे हाथों में इक शक़्ल चाँद जैसी थी तुम्हें ये कैसे बताएं वो रात कैसी थी महक रहे थे मिरे होंठ उसकी ख़ुश्बू से अजीब आग थी बिलकुल गुलाब जैसी…

सोये कहाँ थे आँखों ने तकिये भिगोए थे 

सोये कहाँ थे आँखों ने तकिये भिगोए थे हम भी कभी किसी के लिए ख़ूब रोए थे अँगनाई में खड़े हुए बेरी के पेड़ से वो लोग चलते वक़्त गले…

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे…

आगे नैं डूंघी

आगे नैं डूंघी, मैं कित गुन लंघसां पारि ।। राति अन्नेरी पंधि दुराडा, साथी नहीयों नालि ।1। नालि मलाह दे अणबनि होई, उह सचे मैं कूड़ि विगोई, कै दरि करीं…