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रात भी है कुछ भीगी- भीगी

रात भी है कुछ भीगी- भीगी, चांद भी है कुछ मद्धम-मद्धम तुम आओ तो आँखें खोले, सोई हुई पायल की छम-छम किसको बताएँ, कैसे बताएँ, आज अजब है दिल का…

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ मैने जज़बात निभाए हैं उसूलों की जगह अपने अरमान पिरो लाया…

सन्देह

बहती जिस नक्षत्रलोक में निद्रा के श्वासों से बात, रजतरश्मियों के तारों पर बेसुध सी गाती है रात! अलसाती थीं लहरें पीकर मधुमिश्रित तारों की ओस, भरतीं थीं सपने गिन…

मिलन

रजतकरों की मृदुल तूलिका से ले तुहिन-बिन्दु सुकुमार, कलियों पर जब आँक रहा था करूण कथा अपनी संसार; तरल हृदय की उच्छ्वास जब भोले मेघ लुटा जाते, अन्धकार दिन की…

क़ौमी एकता

यह तवाइफ़ कई मर्दों को पहचानती है शायद इसीलिए दुनिया को ज़्यादा जानती है -उसके कमरे में हर मज़हब के भगवान की एक-एक तस्वीर लटकी है ये तस्वीरें लीडरों की…

दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में

दिन को भी इतना अन्धेरा है मेरे कमरे में साया आते हुए डरता है मेरे कमरे में ग़म थका हारा मुसाफ़िर है चला जाएगा कुछ दिनों के लिए ठहरा है…

कितनी सदियों से ढूँढ़ती होंगी

कितनी सदियों से ढूँढ़ती होंगी तुमको ये चाँदनी की आवज़ें पूर्णमासी की रात जंगल में नीले शीशम के पेड़ के नीचे बैठकर तुम कभी सुनो जानम भीगी-भीगी उदास आवाज़ें नाम…

ज़मीं से आँच ज़मीं तोड़कर निकलती है

ज़मीं से आँच ज़मीं तोड़कर निकलती है अजीब तिश्नगी इन बादलों से बरसी है मेरी निगाह मुख़ातिब से बात करते हुए तमाम जिस्म के कपड़े उतार लेती है सरों पे…

चल मुसाफ़िर बत्तियाँ जलने लगीं 

चल मुसाफ़िर बत्तियाँ जलने लगीं आसमानी घंटियाँ बजने लगीं दिन के सारे कपड़े ढीले हो गए रात की सब चोलियाँ कसने लगीं डूब जायेंगे सभी दरिया पहाड़ चांदनी की नद्दियाँ…

उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर

उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर नीले बादल के इक गाँव में जायेंगे धूप माथे पे अपने सजा लायेंगे साये पलकों के पीछे छुपा लायेंगे बर्फ पर तैरते रोशनी…

सब्ज़ पत्ते धूप की ये आग जब पी जाएँगे

सब्ज़ पत्ते धूप की ये आग जब पी जाएँगे उजले फर के कोट पहने हल्के जाड़े आएँगे गीले-गीले मंदिरों में बाल खोले देवियाँ सोचती हैं उनके सूरज देवता कब आएँगे…

ख़ुश्बू को तितलियों के परों में छिपाऊँगा

ख़ुश्बू को तितलियों के परों में छिपाऊँगा फिर नीले-नीले बादलों में लौट जाऊँगा सोने के फूल-पत्ते गिरेंगे ज़मीन पर मैं ज़र्द-ज़र्द शाख़ों पे जब गुनगुनाऊँगा घुल जायेंगी बदन पे जमी…