Tag Archives: mohabbat

वासोख़्त

सच है, हमीं को आपके शिकवे बजा न थे बेशक, सितम जनाब के सब दोस्ताना थे हाँ, जो जफ़ा भी आपने की क़ायदे से की हाँ, हम ही कारबंदे-उसूले-वफ़ा न…

गुम है इक कैफ़ में फ़ज़ा-ए-हयात ख़ामुशी सिजदा-ए-नियाज़ में है

गुम है इक कैफ़ में फ़ज़ा-ए-हयात ख़ामुशी सिजदा-ए-नियाज़ में है हुसन-ए-मासूम ख़वाब-ए-नाज़ मैं है ऐ कि तू रंग-ओ-बू का तूफ़ां है ऐ कि तू जलवागर बहार में है ज़िन्दगी तेरे…

दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के

दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के वीराँ है मयकदः ख़ुमो-सागर उदास हैं तुम क्या गये कि रूठ गए दिन बहार के…

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे बहुत तलाश किया कोई आदमी…

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे

आपसे बेहद मुहब्बत है मुझे आप क्यों चुप हैं ये हैरत है मुझे शायरी मेरे लिए आसाँ नहीं झूठ से वल्लाह नफ़रत है मुझे रोज़े-रिन्दी है नसीबे-दीगराँ शायरी की सिर्फ़ क़ूवत है…

डरता हूँ कामियाबी-ए-तकदीर देखकर.

डरता हूँ कामियाबी-ए-तकदीर देखकर. यानी सितमज़रीफ़ी-ए-तकदीर देखकर. कालिब में रूह फूँक दी या ज़हर भर दिया. मैं मर गया ह्यात की तासीर देखकर. हैरां हुए न थे जो तसव्वुर में…

न जाने अश्क से आँखों में क्यों है आये हुए

न जाने अश्क से आँखों में क्यों है आये हुए गुज़र गया ज़माना तुझे भुलाये हुए जो मन्ज़िलें हैं तो बस रहरवान-ए-इश्क़ की हैं वो साँस उखड़ी हुई पाँव डगमगाये…

हिंज़ाबों में भी तू नुमायूँ नुमायूँ

हिंज़ाबों में भी तू नुमायूँ नुमायूँ फरोज़ाँ फरोज़ाँ दरख्शाँ दरख्शाँ तेरे जुल्फ-ओ-रुख़ का बादल ढूंढता हूँ शबिस्ताँ शबिस्ताँ चाराघाँ चाराघाँ ख़त-ओ-ख़याल की तेरे परछाइयाँ हैं खयाबाँ खयाबाँ गुलिस्ताँ गुलिस्ताँ जुनूँ-ए-मुहब्बत…

ना जाना आज तक क्या शै खुशी है

ना जाना आज तक क्या शै खुशी है हमारी ज़िन्दगी भी ज़िन्दगी है तेरे गम से शिकायत सी रही है मुझे सचमुच बडी शर्मिन्दगी है मोहब्बत में कभी सोचा है…

सर में सौदा भी नहीं

सर में सौदा भी नहीं, दिल में तमन्ना भी नहीं लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं यूँ तो हंगामा उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क मगर ऐ दोस्त, कुछ ऐसों का ठिकाना…

मुझको मारा है हर इक दर्द-ओ-दवा से

मुझको मारा है हर इक दर्द-ओ-दवा से पहले दी सज़ा इश्क ने हर ज़ुर्म-ओ-खता से पहले आतिश-ए-इश्क भडकती है हवा से पहले होंठ जलते हैं मोहब्बत में दुआ से पहले…

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूँ ही कभी लब खोले हैं पहले “फ़िराक़” को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं दिन में हम को देखने वालो अपने-अपने…