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दो सोचें

सुबह जब अख़बार ने मुझसे कहा ज़िन्दगी जीना बहुत दुश्वार है सरहदें फिर शोर-गुल करने लगीं ज़ंग लड़ने के लिए तैयार है दरमियाँ जो था ख़ुदा अब वो कहाँ आदमी…

सुनो पानी में किसकी सदा है 

सुनो पानी में किसकी सदा है कोई दरिया की तह में रो रहा है सवेरे मेरी इन आँखों ने देखा ख़ुदा चारों तरफ़ बिखरा हुआ है समेटो और सीने में…

एक

वो बेमकान, खुदा का नूर जिसके अन्दर है उसको माज़ी, मुस्तक़्बिल व हाल किधर है ? तेरे रिश्ते से है माज़ी और मुस्तक़्बिल वो एक चीज़ है दोनों, तू समझता…

मस्जिद

बेवकूफ़ मस्जिद में जाकर तो झुकते हैं मगर दिल वालों पर वो सितम करते हैं वो बस इमारत है असली हक़ीक़त यहीं है सरवरों के दिल के सिवा मस्जिद नहीं…

मुख़ालिफ़

  खुदा ने रंज व ग़म इस लिए हैं बनाए ताकि ख़िलाफ़ उसके खुशी नज़र आए मुख़ालफ़त से सारी चीज़ें होती हैं पैदा कोई नहीं मुख़ालिफ़ उसका वो है छिपा…

नायाब इल्म

सोने और रुपये से भर जाय जंगल अगर बिना मर्ज़ी ख़ुदा की ले नहीं सकते कंकर सौ किताबें तुम पढ़ो अगर कहीं रुके बिना नुक़्ता ना रहे याद खुदा की…

दुश्वार

हज़रते ईसा से पूछा किसी ने जो था हुशियार इस हस्ती में चीज़ कया है सबसे ज़्यादा दुश्वार बोले ईसा सबसे दुश्वार ग़ुस्सा ख़ुदा का है प्यारे कि जहन्नुम भी…

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा । इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा । हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ़ भी चल…

सियाहियों के बने हर्फ़-हर्फ़ धोते हैं

सियाहियों के बने हर्फ़-हर्फ़ धोते हैं ये लोग रात में काग़ज़ कहाँ भिगोते हैं किसी की राह में दहलीज़ पर दिया न रखो किवाड़ सूखी हुई लकड़ियों के होते हैं…

अज्मतें सब तिरी ख़ुदाई की

अज्मतें सब तिरी ख़ुदाई की हैसियत क्या मिरी इकाई की मेरे होंठों के फूल सूख गए तुमने क्या मुझसे बेवफाई की सब मिरे हाथ पाँव लफ्ज़ों के और आँखें भी…

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे बहुत तलाश किया कोई आदमी…

वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है

वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिये बनाया है…