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किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊंगा

किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊंगा ज़माना देखेगा और मैं न देख पाऊंगा हयातों मौत फ़िराक़ों विसाल सब यकजा मैं एक रात में कितने दीये जलाऊंगा पला बढ़ा हूँ…

न जी भर के देखा न कुछ बात की

न जी भर के देखा न कुछ बात की बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की उजालों की परियाँ…

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे…

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है मुझ को ख़बर नहीं मेरी मिट्टी कहाँ की है कुछ ताज़गी हो लज्जत-ए-आज़ार के लिए हर दम मुझे तलाश नए आसमां की…