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शोरिशे-बरबतो-नै

  पहली आवाज़ अब सई का इमकां और नहीं, परवाज़ का मज़मूं हो भी चुका तारों पे कमन्दें फेंक चुके, महताब पे शबख़ूं हो भी चुका अब और किसी फ़रदा…

हंगामे रात के

  हम आ गए चूँकि हंगामे में रात के ले आये क्या-क्या दरया से रात के रात के परदे में है वो छिपा हुआ गवाह दिन भला बराबर में है…

हसरतें ले गए इस बज़्म से चलने वाले

हसरतें ले गए इस बज़्म से चलने वाले हाथ मलते ही उठे इत्र के मलने वाले वो गए गोर-ए-गरीबाँ पे तो आई ये सदा थम ज़रा ओ रविश-ए-नाज़ से चलने…

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुतां की है मुझ को ख़बर नहीं मेरी मिट्टी कहाँ की है कुछ ताज़गी हो लज्जत-ए-आज़ार के लिए हर दम मुझे तलाश नए आसमां की…

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में 

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में…

फिर गई आप की दो दिन में तबीयत कैसी 

फिर गई आप की दो दिन में तबीयत कैसी ये वफ़ा कैसी थी साहब ! ये मुरव्वत कैसी दोस्त अहबाब से हंस बोल के कट जायेगी रात रिंद-ए-आज़ाद हैं, हमको शब-ए-फुरक़त…