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ग़म-ब-दिल, शुक्र-ब-लब, मस्तो-ग़ज़लख़्वाँ चलिए जब तलक साथ तेरे उम्रे-गुरेज़ां चलिए

ग़म-ब-दिल, शुक्र-ब-लब, मस्तो-ग़ज़लख़्वाँ चलिए जब तलक साथ तेरे उम्रे-गुरेज़ां चलिए रहमते-हक से जो इस सम्त कभी राह निकले सू-ए-जन्नत भी बराहे-रहे-जानां चलिए नज़र मांगे जो गुलसितां से ख़ुदावन्दे-जहां सागरो-ख़ुम में…

तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी तेरे जाँ-निसार चले गए

तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी तेरे जाँ-निसार चले गए तेरी रह में करते थे सर तलब सरे-रहगुज़ार चले गए तेरी कज़-अदाई से हार के शबे-इंतज़ार चली गई मेरे…

वासोख़्त

सच है, हमीं को आपके शिकवे बजा न थे बेशक, सितम जनाब के सब दोस्ताना थे हाँ, जो जफ़ा भी आपने की क़ायदे से की हाँ, हम ही कारबंदे-उसूले-वफ़ा न…

दिल में अब, यूँ तिरे भूले हुए ग़म आते हैं

दिल में अब, यूँ तिरे भूले हुए ग़म आते हैं जैसे बिछड़े हुये का’बे में सनम आते हैं एक-इक कर के हुए जाते हैं तारे रौशन मेरी मंज़िल की तरफ़…

दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के

दोनों जहान तेरी मोहब्बत मे हार के वो जा रहा है कोई शबे-ग़म गुज़ार के वीराँ है मयकदः ख़ुमो-सागर उदास हैं तुम क्या गये कि रूठ गए दिन बहार के…

ग़मों की आयतें शब भर छतों पे चलती हैं इमाम बाड़ों से

ग़मों की आयतें शब भर छतों पे चलती हैं इमाम बाड़ों से सैदानियाँ निकलती हैं उदासियों को सदा दिल के ताक में रखना ये मोमबत्तियाँ हैं, फ़ुर्सतों में जलती हैं…

हर जलवे से एक दरस-ए-नुमू लेता हू

हर जलवे से एक दरस-ए-नुमू लेता हूँ लबरेज़ कई जाम-ओ-सुबू लेता पड़ती है जब आँख तुझपे ऐ जान-ए-बहार संगीत की सरहदों को छू लेता हूँ हर साज़ से होती नहीं…

सितारों से उलझता जा रहा हूँ 

सितारों से उलझता जा रहा हूँ शब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँ तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ जहाँ को भी समझा रहा हूँ यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल…

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया बरबादियों का सोग़ मनाना फ़ुजूल था बरबादियों का जश्न मनाता चला गया जो मिल गया…

मैं ही सुदामा हूं

हम दोस्ती निभाते रहे दोस्ताने की तरह आप रंग बदलने लगे जमाने की तरह। कहीं हम खुद को ही बेगाना ना समझ लें पेश आया ना करो यूं हमसे बेगाने…

किसी को उदास देखकर

तुम्हे उदास सी पाता हूं मैं कई दिन से, न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम? वो शोखियां वो तबस्सुम वो कहकहे न रहे हर एक चीज को…

ख़ुद्दारियों के ख़ून को अरज़ाँ न कर

ख़ुद्दारियों के ख़ून को अरज़ाँ न कर सके हम अपने जौहरों को नुमायाँ न कर सके होकर ख़राब-ए-मय तेरे ग़म तो भुला दिये लेकिन ग़म-ए-हयात का दरमाँ न कर सके…