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धूप क्या है और साया क्या है

धूप क्या है और साया क्या है अब मालूम हुआ ये सब खेल तमाशा क्या है अब मालूम हुआ हँसते फूल का चेहरा देखूँ और भर आई आँख अपने साथ…

एक तस्वीर

सुबह की धूप खुली शाम का रूप फ़ाख़्ताओं की तरह सोच में डूबे तालाब अज़नबी शहर के आकाश धुंधलकों की किताब पाठशाला में चहकते हुए मासूम गुलाब घर के आँगन…

उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर

उड़ती किरणों की रफ़्तार से तेज़ तर नीले बादल के इक गाँव में जायेंगे धूप माथे पे अपने सजा लायेंगे साये पलकों के पीछे छुपा लायेंगे बर्फ पर तैरते रोशनी…

दालानों की धूप छतों की शाम कहाँ 

दालानों की धूप छतों की शाम कहाँ घर के बाहर घर जैसा आराम कहाँ बाज़ारों की चहल-पहल से रोशन है इन आँखों में मंदिर जैसी शाम कहाँ मैं उसको पहचान…

किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊंगा

किसे ख़बर थी तुझे इस तरह सजाऊंगा ज़माना देखेगा और मैं न देख पाऊंगा हयातों मौत फ़िराक़ों विसाल सब यकजा मैं एक रात में कितने दीये जलाऊंगा पला बढ़ा हूँ…

एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं 

एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं…

अब किसे चाहें किसे ढूँढा करें

अब किसे चाहें किसे ढूँढा करें वो भी आख़िर मिल गया अब क्या करें हल्की-हल्की बारिशें होती रहें हम भी फूलों की तरह भीगा करें आँख मूँदे उस गुलाबी धूप…

सन्नाटा क्या चुपके-चुपके कहता है

सन्नाटा क्या चुपके-चुपके कहता है सारी दुनिया किसका रैन-बसेरा है आसमान के दोनों कोनों के आख़िर एक सितारा तेरा है, इक मेरा है अंडा मछली छूकर जिनको पाप लगे उनका…

याद किसी की चांदनी बन कर कोठे-कोठे छिटकी है

याद किसी की चांदनी बन कर कोठे-कोठे छिटकी है याद किसी की धूप हुई है ज़ीना-ज़ीना उतरी है रात की रानी सहने-चमन में गेसू खोले सोती है रात बॆ रात…

माटी की कच्ची गागर को क्या खोना

माटी की कच्ची गागर को क्या खोना क्या पाना बाबा माटी को माटी है रहना, माटी में मिल जाना बाबा हम क्या जानें दीवारों से कैसे धूप उतरती होगी रात…