Tag Archives: aankho

वे दिन

नव मेघों को रोता था जब चातक का बालक मन, इन आँखों में करुणा के घिर घिर आते थे सावन! किरणों को देख चुराते चित्रित पंखों की माया, पलकें आकुल…

सूनापन

मिल जाता काले अंजन में सन्ध्या की आँखों का राग, जब तारे फैला फैलाकर सूने में गिनता आकाश; उसकी खोई सी चाहों में घुट कर मूक हुई आहों में! झूम…

खाना-आबादी

तराने गूंज उठे हैं फजां में शादियानों के हवा है इत्र-आगीं, ज़र्रा-ज़र्रा मुस्कुराता है मगर दूर, एक अफसुर्दा मकां में सर्द बिस्तर पर कोई दिल है की हर आहट पे…

एक वाकया

अंधियारी रात के आँगन में ये सुबह के कदमों की आहट ये भीगी-भीगी सर्द हवा, ये हल्की हल्की धुन्धलाहट गाडी में हूँ तनहा महवे-सफ़र और नींद नहीं है आँखों में…

मैं क्या अगर अनफ़ास के सब तार

तो फिर मैं क्या अगर अनफ़ास के सब तार गुम उस में मेरे होने न होने के सभी आसार गुम उस में मेरी आँखों में इक मौसम हमेशा सब्ज़ रहता…

सुनो पानी में किसकी सदा है 

सुनो पानी में किसकी सदा है कोई दरिया की तह में रो रहा है सवेरे मेरी इन आँखों ने देखा ख़ुदा चारों तरफ़ बिखरा हुआ है समेटो और सीने में…

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं बाइस-ए-तर्क-ए मुलाक़ात बताते भी नहीं मुंतज़िर हैं दमे रुख़सत के ये मर जाए तो जाएँ फिर ये एहसान के हम छोड़…

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले…

होंठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते

होंठों पे मुहब्बत के फ़साने नहीं आते साहिल पे समुंदर के ख़ज़ाने नहीं आते पलकें भी चमक उठती हैं सोते में हमारी आँखों को अभी ख़्वाब छुपाने नहीं आते दिल…

कोई लश्कर है कि बढ़ते हुए ग़म आते हैं 

कोई लश्कर है कि बढ़ते हुए ग़म आते हैं शाम के साए बहुत तेज़ क़दम आते हैं दिल वो दरवेश है जो आँख उठाता ही नहीं इसके दरवाजे पे सौ…

सोये कहाँ थे आँखों ने तकिये भिगोए थे 

सोये कहाँ थे आँखों ने तकिये भिगोए थे हम भी कभी किसी के लिए ख़ूब रोए थे अँगनाई में खड़े हुए बेरी के पेड़ से वो लोग चलते वक़्त गले…