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एक दकनी ग़ज़ल

  कुछ पहले इन आँखों आगे क्या-क्या न नज़ारा गुज़रे था क्या रौशन हो जाती थी गली जब यार हमारा गुज़रे था थे कितने अच्छे लोग कि जिनको अपने ग़म…

जो इधर से जा रहा है वही मुझ पे मेहरबाँ है

जो इधर से जा रहा है वही मुझ पे मेहरबाँ है कभी आग पासबाँ है, कभी धूप सायबाँ है बड़ी आरज़ू थी मुझसे कोई ख़ाक रो के कहती उतर आ…

काली काली आँखों का काला काला जादू है

काली काली आँखों का काला काला जादू है आधा आधा तुझ बिन मैं आधी आधी सी तू है काली काली आँखों का काला काला जादू है आज भी जुनूनी सी…

वो जो शायर था चुप सा रहता था

वो जो शायर था चुप सा रहता था बहकी-बहकी सी बातें करता था आँखें कानों पे रख के सुनता था गूंगी ख़ामोशियों की आवाज़ें जमा करता था चाँद के साए…

हुस्न का जादू जगाए इक ज़माना हो गया

हुस्न का जादू जगाए इक ज़माना हो गया. ऐ सुकूते-शामे-ग़म फिर छेड़ उन आँखों की बात. ज़िन्दगी को ज़िन्दगी करना कोई आसाँ न था. हज़्म करके ज़हर को करना पड़ा…

जिससे कुछ चौंक पड़ें सोई हुई तकदीरें

जिससे कुछ चौंक पड़ें सोई हुई तकदीरें. आज होता है उन आँखों का इशारा भी कहाँ ! मैं ये कहता हूँ कि अफ़लाक से आगे हूँ बहुत. इश्क़ कहता है अभी…

हिंज़ाबों में भी तू नुमायूँ नुमायूँ

हिंज़ाबों में भी तू नुमायूँ नुमायूँ फरोज़ाँ फरोज़ाँ दरख्शाँ दरख्शाँ तेरे जुल्फ-ओ-रुख़ का बादल ढूंढता हूँ शबिस्ताँ शबिस्ताँ चाराघाँ चाराघाँ ख़त-ओ-ख़याल की तेरे परछाइयाँ हैं खयाबाँ खयाबाँ गुलिस्ताँ गुलिस्ताँ जुनूँ-ए-मुहब्बत…

वे दिन

नव मेघों को रोता था जब चातक का बालक मन, इन आँखों में करुणा के घिर घिर आते थे सावन! किरणों को देख चुराते चित्रित पंखों की माया, पलकें आकुल…

सूनापन

मिल जाता काले अंजन में सन्ध्या की आँखों का राग, जब तारे फैला फैलाकर सूने में गिनता आकाश; उसकी खोई सी चाहों में घुट कर मूक हुई आहों में! झूम…

खाना-आबादी

तराने गूंज उठे हैं फजां में शादियानों के हवा है इत्र-आगीं, ज़र्रा-ज़र्रा मुस्कुराता है मगर दूर, एक अफसुर्दा मकां में सर्द बिस्तर पर कोई दिल है की हर आहट पे…

एक वाकया

अंधियारी रात के आँगन में ये सुबह के कदमों की आहट ये भीगी-भीगी सर्द हवा, ये हल्की हल्की धुन्धलाहट गाडी में हूँ तनहा महवे-सफ़र और नींद नहीं है आँखों में…

मैं क्या अगर अनफ़ास के सब तार

तो फिर मैं क्या अगर अनफ़ास के सब तार गुम उस में मेरे होने न होने के सभी आसार गुम उस में मेरी आँखों में इक मौसम हमेशा सब्ज़ रहता…